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दि राइजिंग न्‍यूज

लखनऊ।

 

आज ओपी सिंह ने उत्तर प्रदेश के नए डीजीपी का कार्यभार ग्रहण कर लिया। लखनऊ में हनुमान सेतु पर हनुमान मंदिर में दर्शन के बाद 1983 बैच के आइपीएस अधिकारी उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक के कार्यालय पहुंचे।

 

 

 

22 दिन से जारी कशमकश के बाद आखिरकार यूपी के डीजीपी पद की कुर्सी पर ओपी सिंह की ताजपोशी हो गई। ओम प्रकाश सिंह डीजी सीआइएसएफ का पद छोड़कर यूपी वापस आ गए। इसके बाद उन्हें डीजीपी पद सौंपे जाने का औपचारिक आदेश जारी कर दिया गया। प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार ने बताया ओपी सिंह ने आज अपना कार्यभार ग्रहण कर लिया है।

 

 

 

हनुमान मंदिर में किया दर्शन

आज सुबह लखनऊ पहुंचने के बाद ओपी सिंह सबसे पहले हनुमान मंदिर पहुंचे और यहां हनुमान जी के दर्शन करने के बाद वह पुलिस मुख्यालय पहुंचे।

उल्‍लेखनीय है कि प्रदेश के डीजीपी सुलखान सिंह तीन महीने का एक्सटेंशन मिलने के बाद 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त हो गए थे। इसके बाद ओपी सिंह ने नाम पर मुहर लगी। डीजीपी ओपी सिंह को रविवार को केंद्र से रिलीव कर दिया था।

 

 

नए डीजीपी के राजधानी पहुंचने के बाद से पुलिस के आलाअधिकारी उन्हें सुबह से ही पुष्पगुच्छ देकर बधाई देते नजर आए। चार्ज ग्रहण करने के बाद डीजीपी ने प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर जोर दिया। उन्हें कल नई दिल्ली में सीआइसीएफ के अधिकारियों ने रैतिक परेड करके भावभीनी विदाई दी।

 

 

कौन हैं ओपी सिंह?

ओपी सिंह बिहार के गया जिले के मीरा बिगहा गांव के रहने वाले हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, नेशनल डिफेंस कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर चुके सिंह आपदा प्रबन्धन में एमबीए के साथ-साथ एम. फिल डिग्रीधारी हैं। वह 1983 बैंच के यूपी कैडर के आइपीएस ऑफिसर हैं। वह केंद्र और यूपी में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभा चुके हैं।

ओपी सिंह को 1993 में बहादुरी के लिए इंडियन पुलिस मेडल, 1999 में सराहनीय सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस मेडल और 2005 में विशिष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक मिल चुका है।

 

 

लखनऊ के एसएसपी रहे चुके हैं ओपी सिंह

1983 बैच के आइपीएस ओमप्रकाश सिंह अल्मोड़ा, खीरी, बुलंदशहर, लखनऊ, इलाहाबाद, मुरादाबाद में बतौर एसएसपी काम कर चुके हैं। ओपी सिंह तीन बार लखनऊ के एसएसपी रह चुके हैं। आजमगढ़ और मुरादाबाद के डीआइजी व मेरठ जोन के आइजी भी रह चुके हैं। इनके पास सीआरपीएफ का लंबा अनुभव है।

 

 

दूसरी बार, दो जून 1995 को अचानक उनका तबादला इलाहाबाद से लखनऊ किया गया, लेकिन कुछ ही घंटे बाद हुए गेस्ट हाउस कांड के कारण उन्हें दो दिन में ही सस्पेंड कर दिया गया। तीसरी बार वह भाजपा की कल्याण सिंह की सरकार में लखनऊ के एसएसपी बने। तीन माह नौ दिन तक इस पद पर रहने के बाद उन्हें भ्रष्टाचार निवारण संगठन भेज दिया गया।

 

 

ये चुनौतियां हैं नए डीजीपी के सामने

नए डीजीपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यूपी में कानून व्यवस्था को लेकर है। प्रदेश की कानून व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। राजधानी लखनऊ में चार दिनों के अंदर कई बड़ी डकैतियां हो चुकी हैं, जबकि दो लोगों की हत्या भी की गई है। आतंकवाद, संगठित अपराधों से निपटने की रणनीति को जमीन पर उतारने की चुनौती होगी।

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