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दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

लोकसभा–विधानसभा चुनाव के बाद अब प्रदेश में निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का दबदबा शुक्रवार सुबह मतगणना शुरू होने के साथ ही दिखने लगा। खास बात यह रही कि तमाम दावों के बावजूद शहरों में समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस पार्टी कहीं भी मेयर पद पर लड़ती नहीं दिखी।

अलबत्ता बहुजन समाज पार्टी ने जरूर तीन शहरों में मजबूती से लड़ती दिखाई दी। बहुजन समाजपार्टी का प्रदर्शन काफी अचरज में डालने वाला था। हालांकि निकाय चुनाव के दौरान बहुजन समाजपार्टी के केंद्रीय नेता व अध्यक्ष कहीं प्रचार में नहीं थे। बावजूद उसके उसका प्रदर्शन पिछले चुनाव के मुकाबले कहीं बेहतर दिखाई दिया।

 

 

भारतीय जनता पार्टी ने निकाय चुनाव को लेकर पूरी दमखम लगा रखा था। यही वजह थी कि खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नगर निकाय चुनाव में प्रचार की कमान संभाले हुए थे। नतीजा यह रहा कि भाजपा अपने हिंदू वोट बैंक का ध्रुवीकरण करने में भी सफल रही लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य उत्तर प्रदेश तक में बहुजन समाज पार्टी गैर हिंदू वोटों को सहेजने में सफल दिखी।

 

 

झांसी, गाजियाबाद, इलाहाबाद, सहारनपुर, फिरोजाबाद आदि शहरों में बहुजन समाजपार्टी मजबूती से लड़ती दिखी। राजधानी लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी की मेयर तथा पार्षद प्रत्याशी शुरू से आगे दिखाई दिए। यहां पर गैर हिंदू वोटों का विभाजन भी साफ तौर पर नजर आया। हालांकि दूसरे स्थान पर समाजवादी पार्टी–बहुजन समाज पार्टी एक दूसरे मुकाबिल दिखीं।

 

लखनऊ की मेयर प्रत्‍याशी संयुक्‍ता भाटिया

 

आगरा मुरादाबादा, इलाहाबाद आदि स्थानों पर दूसरे नंबर बहुजन समाज पार्टी ही दिखाई दीं। हालांकि गैर हिंदू मतों के विभाजन का पूरा फायदा भाजपा की झोली में आता दिखा लेकिन कांग्रेस के लिहाज से इन चुनाव में कुछ नहीं था। राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष पर ताजपोशी के ठीक पहले उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव उनके लिए चिंता वाले बन गए हैं। कांग्रेस के लिए शुरुआती रुझान तो पूरी तरह से हताशाजनक थे।

 

 

खूब चला भाजपा का हिंदू कार्ड

निकाय चुनाव की मतगणना के नतीजों से शुरू से ही भाजपा का हिंदू कार्ड एक बार फिर सफल होता नजर आया। इसके साथ ही बिखरे विपक्ष ने भाजपा की राह और आसान कर दीं। हालांकि नगर पालिकाओं के चुनाव में समाजवादी पार्टी कई स्थानों पर संघर्ष में दिखाई दी, लेकिन इससे चुनाव प्रबंधन में खामियों को भी उजागर कर दिया। वजह है कि समाजवादी पार्टी के नेताओं ने निकाय चुनाव में भाजपा को मजबूत टक्कर देने का दावा जरूर किया लेकिन जमीनी स्तर पर बड़े नेता अपने प्रत्याशियों से दूरी बनाए दिखे। इसका असर परिणाम नतीजों पर भी दिखने लगा था। समाजवादी पार्टी की आंतरिक कलह का फायदा सीधे बहुजन समाजपार्टी को मिलता दिखा।

 

 

बसपा के लिए शुभ संकेत

निकाय चुनाव ने विधानसभा चुनाव में साफ हो जाने वाली बहुजन समाज पार्टी के लिए शुभ संकेत की तरह से माने जा रहे हैं। निकाय चुनाव से एक बात तो जरूर साफ हो गई कि बसपा का ग्रास रूट वोट बैंक एक बार फिर संगठित दिख रहा है। यही कारण था कि बहुजन समाज पार्टी 16 में से 11 शहरों में मजबूती से लड़ती दिखी। साथ ही जहां कहीं बसपा प्रत्याशियों को परंपरागत को गैर हिंदू वोट मिले, वहां पार्टी जीतने में सफलता पाती दिखीं।

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