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दि राइजिंग न्‍यूज

कानपुर।

 

कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का कोई इलाज नहीं है। जिस किसी को भी यह रोग हो जाता है वह इसकी पीड़ा सहन नहीं कर पाता और न जाने कब इस दुनिया को छोड़ देता है। इस रोग से न जाने कितनी बड़ी हस्तियों और सेलिब्रिटीज की जान चली गई। बमुश्किल ही कोई व्यक्ति इस रोग से लड़ पाया हो, मगर हां यदि अंदर लड़ने की इच्छा और दृढ़ शक्ति हो तो ऐसे कई केस सॉल्व भी हुए हैं।

इस जानलेवा रोग से लड़ने और ताकत देने के लिए कानपुर में भाई-बहन की एक जोड़ी ने एक कीमो-डॉल बनायी है, जो कैंसर मरीजों की दोस्त होगी। साथी ही वह डॉल मरीजों के अंदर दृढ़ विश्वास भरने का काम करेगी।

 

 

कैंसर से लड़ रहे मरीजों के हौसले को सलाम देने के लिए बनाई डॉल

कानपुर निवासी ऋषभ और स्वप्निल की जोड़ी ने इस डॉल को खासकर कैंसर के मरीजों के लिए बनाया है। इस डॉल की खासियत है यह कि जिस तरह कैंसर के मरीजों को कीमोथेरेपी दी जाती है, जिसमें उनके बाल उड़ जाते हैं ठीक उसी तरह से इन डॉल्स के सर पर भी बाल नहीं हैं। इस डॉल को धागे से बनाया गया है। साथ ही इस डॉल को पेशेंट वाली ड्रेस पहनाई गई है।

कीमो-डॉल को इस तरह तैयार किया गया है कि वह कैंसर के पीड़ित मरीजों के अंदर जीने का आत्मविश्वास और दृढ़विश्वास भरने का काम करेगी। डॉल के हाथ में एक रंगीन टोपी है और चेहरे पर दृढ़ विश्वास, जो दर्शा रही है कि हम इस जंग से लड़ सकते हैं। इसको बनाने का मकसद यह है कि कैंसर के मरीज ये डॉल लेकर उन्हें अपना दोस्त समझते हुए जिंदगी की जंग जीतें।

 

 

मां की मौत के बाद से आया यह ख्याल

इस डॉल को बनाने वाले भाई-बहन की जोड़ी ऋषभ और स्वप्निल ने बताया कि उनकी मां कैंसर से पीड़ित थीं और कैंसर से लड़ते-लड़ते उनकी जान चली गई। इसलिए कैंसर के दर्द को दोनों भाई-बहन ने नजदीक से महसूस किया और वहीं से प्रेरणा लेकर कीमो डॉल का निर्माण किया। डॉल के साथ उन्होंने की रिंग की चेन भी बनाई है।

 

 

 

मरीजों को मुफ्त में दी जाती है डॉल

इस डॉल को बनाने का मकसद ही यही था कि इस डॉल में  आत्मविश्वास को दिखाया गया है। इस डॉल का निर्माण कैंसर के मरीजों को सम्मान देना और उनको सलाम करना है। उन्‍होंने बताया कि 2017 से इस डॉल का निर्माण किया जा रहा है और अभी तक दोनों भाई-बहन 200 कीमो डॉल एनजीओ और कैंसर के मरीजों को दे चुके हैं। इस डॉल का कोई मूल्य नहीं है, क्योंकि यह मरीजों को मुफ्त में दी जाती है।

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