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दि राइजिंग न्यूज़

लखनऊ।

 

एक ऐतिहासिक विरासत जो अपनी तामीर की पांच सदियों में जाने कितने सियासी उथल-पुथल और हुकूमती फरमानों की गवाह बनी। पर उसकी गवाही कभी अपने वजूद के काम नहीं आई। सदियों के साथ वो सियासी विवाद में उलझती गई। मस्जिद और मंदिर के दावों में बंटती गई। अयोध्या को लेकर आज भी परचम दोनों दावों का बुलंद होता है। इस पर फैसला अब अदालत को करना है।

 

इसी साल के अगस्त महीने की बात है। देश की सबसे ऊंची अदालत में जब 7 साल बाद मुकदमे के दस्तावेज खुले, तब दो रास्ते दिखे थे-एक रास्ता सर्वोच्च अदालत के अंतिम फैसले का और दूसरा पक्षकारों के बीच आपसी सुलह का।

कानून की भाषा में इसे ऑउट ऑफ कोर्ट सेटेलमेंट कहते हैं, जिसका विकल्प चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली खंडपीठ ने सुझाया था। चाहो तो आपस में मिल बैठकर मामला सुलझा लो। कोर्ट ऐसे किसी भी फैसले का सम्मान करेगी, जिसमें मुकदमे के तीनों पक्षों की बराबर सहमति हो।

 

हालांकि सुलह या उसके किसी फॉर्मूले का सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। मंदिर-मस्जिद विवाद के तीनों पक्षकार यहां भी अयोध्या के दस्तावेजी सबूत और अपनी अपनी गवाहियों के साथ आमने-सामने हैं। बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2010 में अरसे बाद अपना फैसला सुनाया तो तीनों पक्षकार ने सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और टाइटिल केस में याचिका लगाईं।

हाईकोर्ट फॉर्मूला और SC में अपील

 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पूरे विवादित परिसर को तीन बराबर हिस्सों में बांटा था। रामलला की मूर्ति वाली जगह कोर्ट ने रामलला विराजमान पक्ष को दी, जबकि सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े के हवाले किया। बाकी का एक तिहाई हिस्सा कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया। हाईकोर्ट के फैसले से कोई पक्षकार सहमत नहीं हुई और उन्होंने फैसलों को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी। इस तरह सभी पक्षकार सुप्रीमकोर्ट पहुंचे।

समझौते की कोशिश

 

बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद कुछ और भी पक्षकार सामने आए, जिनमें शिया वक्फ बोर्ड खुद को अहम पक्ष मानता है। ये वही शिया वक्फ बोर्ड है, जिसने श्री श्री रविशंकर की अगुवाई में मंदिर-मस्जिद विवाद को खत्म करने का फॉर्मूला सुझाया। लेकिन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड इसके फॉर्मूले से इत्तिफाक नहीं रखता। सुन्नी बोर्ड तो शिया वक्फ बोर्ड के मामले में किसी भी तरह की दावेदारी को ही खारिज करता है।

 

सुन्नी वक्फ बोर्ड का ये रुख 1946 से ही है, जब फैजाबाद जिला न्यायालय ने मस्जिद की जमीन पर शिया वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया। शिया बोर्ड ने अदालत में इस बात का दावा 1940 में किया था कि बाबरी मस्जिद शिया समुदाय की है, लिहाजा इसका मालिकाना हक उसे सौंपा जाए। लेकिन अदालत ने उसका दावा खारिज कर दिया। तब से बाबरी मस्जिद की तरफ से अदालत में पैरवी सुन्नी वक्फ बोर्ड ही कर रहा है। लिहाजा शिया वक्फ बोर्ड का फार्मूला कौन सुने?

वक्फ एक्ट का पेंच

 

शिया वक्फ बोर्ड ने हालांकि मस्जिद पर मालिकाना हक को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका लगाई है। लेकिन 2013 के वक्फ एक्ट के मुताबिक एक पेंच और भी है। एक्ट की धारा 29 के मुताबिक कोई भी वक्फ बोर्ड मस्जिद, कब्रिस्तान या दरगाह जैसी धार्मिक जगह और उसकी जमीन को ना तो बेच सकता है और ना ही किसी भी रूप में इसका ट्रांसफर कर सकता। लिहाजा इस रास्ते तो सुलह का कोई रास्ता निकलता नहीं दिखता।

अदालत से ही निकलेगा हल

 

आखिरी समझौते की सूरत अब अदालत में ही दिखती है। इसके लिए मंदिर के पक्षकार चाहते हैं मामले की सुनवाई प्रतिदिन हो, लेकिन मस्जिद पक्ष के पैरोकार ऐसी किसी भी जल्दबाजी में नहीं हैं। इसके अलावा एक पेंच ये भी है कि सुप्रीमकोर्ट में जो दस्तावेज जमा किए गए हैं, वो फारसी, अरबी सहित कई भाषाओं में हैं, जिनके अनुवाद भी होने थे। इसके बाद ही सुप्रीमकोर्ट मामले को पूरी तरह से समझेगा।

जल्दबाजी सिर्फ अयोध्या को लेकर सियासत में है, वर्ना कानूनी लिहाज से तो अयोध्या में आदेश यथास्थिति बनाए रखने के ही हैं। ये आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को सुनाया था। तब कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के बंटवारे के फॉर्मूले पर रोक लगाई थी और सारे पक्षों की अपील सुनने की बात कही थी।

 

तब से लेकर आज तक अयोध्या में पानी बहुत बह चुका है। दिखने में अयोध्या के किनारे की सरयू नदी अब भी वैसी ही शांत है, मगर 6 साल में बदली सियासत के साथ धर्मनगरी का परचम भी बदल चुका है।

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