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दि राइजिंग न्यूज़

नई दिल्ली।

 

केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में दलितों के प्रदर्शन से आरएसएस चिंतित है। इसी के मद्देनज़र संघ ने भाजपा को दलितों के बीच जानें और उनसे बातचीत करके इस स्थिति को सुधारने को कहा है। संघ के मुताबिक, दलित परिवारों के साथ खाना-खाने जैसे सांकेतिक कार्यों तक नहीं सिमटा होना चाहिए बल्कि पार्टी नेताओं को इससे आगे बढ़कर समीक्षा भी करनी होगी।

 

दलितों के बीच खुद को स्थापित करने की जद्दोजहद में RSS

आरएसएस के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतिक्रिया में मार्च के उपद्रव विपक्ष की कारस्तानी थे। उसका कहना है कि मोदी सरकार की दलितों को ताकतवर बनाने वाली कई नीतियों के बावजूद ये उपद्रव हुए। रिपोर्ट के मुताबिक आरएसएस दलितों के बीच खुद को फिर से स्थापित करने की पहल कर रहा है। इसकी एक मिसाल मध्य प्रदेश में चंबल का इलाका है जहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मार्च में जबरदस्त दलित हिंसा हुई थी।

दलितों को वापस लाने की रणनीति

आरएसएस के नेताओं का दावा है कि दो महीने के भीतर उनके कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर और दलितों तथा गैर-दलितों को नजदीक लाने और जख्म भरने के लिए “सामाजिक सौहार्द बैठकें” करके हालात संभाल लिए। आरएसएस के सूत्रों के मुताबिक, चंबल इलाके में मरम्मत का काम मोटे तौर पर हो चुका है। इस बीच अब दलितों को वापस लाने की एक ज्यादा व्यापक रणनीति बनाई जा रही है जो दलित मसीहा बीआर अंबेडकर के इर्दगिर्द घूमती है।

 

बीआर अंबेडकर का दांव खेलने की तैयारी

आरएसएस का कहना है कि अपनी मृत्यु से पहले अंबेडकर संघ के “जातिविहीन समाज” के विचार से बेहद प्रभावित थे। मंसूबा यह है कि आंबेडकर के असली विचार प्रकाशित साहित्य और बातचीत के जरिए दलितों के सामने रखे जाएं और उस चीज को मिटाया जाए जिसे संघ अपने दुश्मनों के हाथों गढ़ी गई दलित विरोधी छवि के तौर पर देखता है।

...तो क्या संघ से प्रभावित से आंबेडकर

संघ के विचारक कहते हैं कि अंबेडकर इस बात से प्रभावित थे कि आरएसएस में किस तरह एक दूसरे की जाति पूछने पर पाबंदी थी। यह बात उन्हें जाहिरा तौर पर निजी तजुर्बे से उस वक्त पता चली थी जब 1930 के दशक में वे दो बार आरएसएस के कार्यक्रमों में आए थे जिनमें संघ के संस्थापक हेडगेवार भी मौजूद थे। इस बीच आरएसएस के समावेशी कार्यक्रम जारी हैं। इनमें एक वह कार्यक्रम भी है जो हरेक गांव में एक मंदिर, एक जल स्रोत और एक अंत्येष्टि स्थल पक्का करने की मांग करता है ताकि छुआछूत का खात्मा हो। जमीन पर संघ को उससे अब भी लड़ना है जिसमें उसे दलितों के सामने अमानवीय, मनुवादी संगठन के तौर पर पेश किया जाता है।

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