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उमर की सियासत: महबूबा की समझ

Editorial | 29-Aug-2016 01:18:42 PM
     
  
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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

जम्मू-कश्मीर के विपक्षी नेताओं की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात सैद्धांतिक रूप में उपयोगी कही जा सकती है। नेशनल कांफ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में आठ विपक्षी पार्टियों का प्रतिनिधिमण्डल प्रधानमंत्री से मिला था। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले वहां कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की गठबंधन सरकार थी। वैसे भी राज्य में सर्वाधिक समय तक इन्हीं की हुकूमत रही है। इसलिए प्रतिनधिमण्डल में शामिल इन दोनों पार्टियों के सदस्यों की अधिक अहमियत थी। इनके अनुभव सर्वाधिक हैं। वैसे भी कश्मीर समस्या पुरानी है। कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस प्रारम्भ से इसमें प्रमुख किरदार के रूप में शामिल रही है। ये आज विपक्ष में हैं। जब ये लोग प्रधानमंत्री से मिलने गए, तो ऐसा लगा जैसे ये अपने अनुभव साझा करेंगे। इससे कश्मीर की जटिल समस्या के समाधान में सहायता मिलेगी। उमर अब्दुल्ला ने नेकनीयत के प्रदर्शन का पूरा प्रयास किया। कहा कि कश्मीर मसले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। राजनीति के अवसर बाद में बहुत मिलेंगे। इस समय सबको मिलकर समस्या के समाधान का प्रयास करना चाहिए, लेकिन उमर अब्दुल्ला ने जो सुझाव दिए, वह राजनीति से ही प्रेरित थे। उन्होंने पैलेट गन पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाने की मांग की। कहा कि समस्या का राजनीतिक समाधान तलाशने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए सरकार को राज्य के सभी लोगों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए।


उमर अब्दुल्ला एक तरफ यह कहते हैं कि कश्मीर मसले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए लेकिन उनके सभी सुझाव राजनीति से प्रेरित हैं। इस बार उन्होंने केन्द्र और प्रदेश सरकार पर सीधे-सीधे कोई आरोप नहीं लगाया। ये बात अलग है कि दिल्ली आने से पहले वह मिलजुल कर समाधान निकालने की बात नहीं कर  रहे थे। तब वह खुलकर राजनीति कर रहे थे केन्द्र के साथ-साथ वह प्रदेश सरकार पर हमला बोल रहे थे। प्रतिनिधिमण्डल के साथ आने के बाद उनकी बातों का तरीका अवश्य बदला। किन्तु वह खुद राजनीति नहीं छोड़ना चाहते। कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के नेता सलाह ऐसे देते हैं, जैसे कश्मीर समस्या का समाधान उनकी जेब में है। इसी बात का प्रदर्शन उन्होंने सर्वदलीय बैठक में किया।


कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के नेता पैलेट गन के प्रयोग पर तत्काल रोक लगाने की मांग करते हैं लेकिन वह यह नहीं बताते कि अलगाववादियों की रणनीति के तहत सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वालों के साथ रियायत क्यों होनी चाहिए। उनको सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए। पैलेट गन के प्रयोग से बच्चों को नुकसान न हो, इसका प्रयास अवश्य होना चाहिए। लेकिन जो वयस्क जानबूझ कर पाकिस्तान का झण्डा लेकर निकलते हैं, उसके समर्थन और भारत के विरोध में नारेबाजी करते हैं, उनको कड़ाई से रोकने का प्रयास क्यों नहीं होना चाहिए। शायद यह कड़े कदमों का ही असर था कि इतने दिनों से चल रहे कर्फ्यू में भी ज्यादा हिंसा नहीं हुई।


विपक्षी प्रतिनिधिमण्डल ने एक बार भी सुरक्षा बलों के साथ हमदर्दी नहीं दिखाई। क्या राजनीतिक समाधान के इंतजार में उन्‍हें हाथ बांधकर खड़े रहना चाहिए, क्या वह अराजकतत्वों के पत्थर खाने के लिए वहां तैनात किए गए हैं। पत्थर फेंकना पाकिस्तान की भारत विरोधी साजिश का हिस्सा है। यह सुरक्षा बलों को उकसाने के लिए होता है। ये पत्थर फेंके और सुरक्षा बल कार्रवाई करे, तब ये सुरक्षा बल को दोष देंगे। यदि कार्रवाई न करें तो कश्मीर को अशांत रखने का मंसूबा कामयाब हो जाएगा। ऐसे में समस्या के समाधान हेतु पत्थरबाजों और पाकिस्तान के हिमायतियों का मनोबल बढ़ेगा। प्रत्येक शासन का यह प्रमुख कर्तव्य होता है कि वह समाज में अराजकता फैलाने वालों को सख्ती से रोके।


ऐसे लोगों से संवाद स्थापित करना उनका मनोबल बढ़ाना है। ऐसे में संवाद केवल शांति चाहने वालों तथा भारत से हमदर्दी रखने वालों से ही हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वीकार भी किया है कि संवाद से समस्या का समाधान हो सकता है। लेकिन संवाद संविधान के दायरे में ही होना चाहिए। असामाजिक और हिंसक तत्वों के लिए संविधान के तहत अलग कार्रवाई की व्यवस्था है।


उमर अब्दुल्ला के मुख्यमंत्री रहते समय ही पत्थरबाजी की शुरुआत हुई थी। फिर उनकी गठबंधन सरकार के समय इसे फिर दोहराया गया। क्या उस समय उमर को यह अनुभव हुआ था कि इन पत्थरबाजों के सामने हाथ जोड़कर संवाद किया जा सकता है अथवा सुरक्षा बलों को अपना बचाव नहीं करना चाहिए।


जाहिर है सर्वदलीय बैठक में काग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस राजनीति करने से बाज नहीं आए। दूसरी ओर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने समाधान की दिशा में उपयोगी बातें रखीं। उनका कहना था कि मात्र पांच प्रतिशत लोग उपद्रव करते हैं, शेष आबादी शांति से रहना चाहती है। ऐसे में संवाद शांति चाहने वालों से हो सकता है। अलगाववादी नेताओं और पत्थरबाजों की हकीकत भी सामने आनी चाहिए। अलगाववादी अपने बच्चों को कश्मीर के बाहर पढ़ाते हैं। पाकिस्तानी धन पर ऐश करते हैं। पत्थरबाज छोटे बच्चों को आगे रखते हैं। इसकी वास्तविकता समाज को समझनी चाहिए। पाकिस्तानी हरकतों का भी माकूल जवाब देना होगा। महबूबा की बातों से लगा कि वह अब समस्या के समाधान के प्रति गंभीर है। कांग्रेस व नेशनल कांफ्रेंस के सुझावों से समाधान होने की संभावना होती तो यह कार्य बहुत पहले हो जाता।



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