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दि राइजिंग न्यूज़

नई दिल्ली।

 

साल 2007 में मक्का मस्जिद ब्लास्ट मामले में NIA की विशेष कोर्ट का आज फैसला आया। कोर्ट ने मामले में असीमानंद समेत सभी पांच आरोपियों को बरी कर दिया है। करीब 11 साल पहले 18 मई 2007 को हुए इस धमाके में नौ लोगों की मौत हुई थी, जबकि 58 लोग घायल हुए थे। पिछले 11 साल में इस मामले में कई तरह के नाटकीय मोड़ आए। कई गवाह अपने बयान से पलटे।

हैदराबाद पुलिस को सौंपी गई थी पहली जांच

दरअसल, जब ये मामला हुआ तो सबसे पहले इसकी जांच हैदराबाद पुलिस ने की। पुलिस ने अपनी जांच में किसी मुस्लिम संगठन का नाम लिया जिसे बाद में सीबीआइ ने खारिज कर दिया। सीबीआइ की जांच में हिंदूवादी संगठन अभिनव भारत का नाम आया। इसके बाद पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

 

68 चश्मदीद की गवाही दर्ज की गई लेकिन...

सीबीआइ अधिकारियों ने 68 चश्मदीद की गवाही दर्ज की थी। इनमें से 54 गवाह अब गवाही से मुकर गए। सीबीआइ ने आरोपपत्र भी दाखिल किया।

दो मिनट में सुना दिया गया फैसला

NIA ने करीब 200 गवाहों से पूछताछ की थी लेकिन आज कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया दो मिनट में ही सुना दिया। जो सबूत रखे गए थे उनसे यह साबित नहीं हो पाया कि ये पांच लोग ही आरोपी हैं। एनआइए के सूत्रों की मानें तो अभी कोर्ट के फैसले का अध्ययन होगा। इसके बाद देखेंगे कि इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में अपील करेंगे या नहीं।

 

दस लोगों को बनाया गया था आरोपी

जांच के बाद इस घटना को लेकर दस लोगों को आरोपी बनाया गया। इसमें अभिनव भारत के सभी सदस्य शामिल है। स्वामी असीमानंद सहित, देवेन्द्र गुप्ता, लोकेश शर्मा उर्फ अजय तिवारी, लक्ष्मण दास महाराज, मोहनलाल रतेश्वर और राजेंद्र चौधरी को मामले में आरोपी बनाया गया था।

AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया है कि सभी आरोपियों ने जून 2014 के बाद अपने बयान से पलटना शुरू किया। NIA ने अपने काम को सही तरीके से नहीं किया, या उन्होंने करने नहीं दिया गया। अगर इसी तरह चलता रहा तो देश में क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का क्या हुआ।

 

अभी भी उठ रहे ये सवाल?

  • दमदार सबूत क्यों नहीं पेश कर पाई NIA?

  • क्या दस्तावेज़ जुटाने में नाकाम रही NIA?

  • कैसे एक-एक गवाह मुकरते चले गए?

  • क्या 9 बेकसूरों को किसी ने नहीं मारा?

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