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दि राइजिंग न्यूज़

लखनऊ।

 

शिक्षा के बाजारीकरण में कुलपति जैसा सम्माननीय पद भी अब अछूता नहीं रहा है। डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय के कुलपति विनय पाठक भ्रष्टाचार, घोटालेबाजी, फर्जी नियुक्ति, पद के लिए फर्जी अनुभव लगाने और बांटने के आरोपों में डूबे हुए हैं। वहीं लखनऊ के ही एक अन्य डॉ.शकुंतला मिश्रा राष्‍ट्रीय पुनर्वास विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. निशीथ राय पर कमोबेश यही आरोप जांच में साबित हुए हैं। हाईकोर्ट के आदेशानुसार शासन ने निशीथ राय पर कार्रवाई के लिए विवि की सामान्य परिषद मंगलवार की बैठक तय की थी। सारी तैयारियां पूरी थीं लेकिन अचानक बैठक स्थगित कर दी गई। आगे की कोई तारीख भी तय नहीं की गई है। बैठक स्थगित होने के पीछे कई कयास लगाए जा रहे हैं, हालांकि शासन की तरफ से अभी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। कहा जाता है कि विनय पाठक और निशीथ राय अच्छे मित्र हैं, और विनय पाठक के रसूख और पहुंच के चर्चे सड़क से लेकर हाईकोर्ट तक पहुंच रहे हैं।

 

दरअसल,प्रो. निशीथ राय पर आरोप है कि एक ही समय में वह दो जगह अपनी सेवाएं दे रहे थे। आरोप के मुताबिक प्रो.राय लखनऊ विश्वविद्यालय में शिक्षण सेवाएं देने के साथ ही साथ क्षेत्रीय नगर एवं पर्यावरण अध्ययन केंद्र के डायरेक्टर भी थे। कुलपति बनने के बाद भी वे केंद्र के डायरेक्टर बने रहे। यह अनियमितता साबित होने पर डॉ. शकुंतला मिश्र विश्‍वविद्यालय में उनकी शक्तियां छीन ली गईं। पूरे मामले में बाकायदा जांच समिति भी बन चुकी थी।  मंगलवार को इस मामले पर निर्णय लेने के लिए सामान्य परिषद की बैठक होनी थी लेकिन यह टाल दी गई। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि इस मीटिंग को जानबूझ कर टाला गया है। बैठक मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में होनी थी इसलिए यह भी संभावना जताई जा रही है कि मुख्यमंत्री को समय न मिलने के कारण फिलहाल बैठक टाली गई है। हालांकि अभी शासन की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

पढ़िए पूरा मामला

दरअसल, प्रो. राय दिनांक 28 जनवरी, 2014 से डॉ. शकुंतला मिश्रा पुर्नवास विश्‍वविद्यालय, लखनऊ में कुलपति पद पर कार्यरत हैं। इससे पूर्व वह लखनऊ विश्वविद्यालय में क्षेत्रीय नगर एवं पर्यावरण अध्ययन केंद्र के निदेशक पद पर कार्यरत थे। अब कुलपति के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के बाद भी निशीथ राय ने ना तो निदेशक का उक्त पद छोड़ा और ना ही शासन को इस बाबत कोई जानकारी मुहैया कराई। इस उपलक्ष्‍य में उन्होंने शासन से कोई अनुमति प्राप्त भी नहीं की।

 

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जब ये गड़बड़ियां उजागर हुईं तो एलयू के कुलपति ने बताया कि गाइडलाइन्स में एक साथ दो जगह कार्य करने का उल्लेख है ही नहीं।

प्रो. राय के इस घपले की पोल प्रो. आरके सिंह (कुलसचिव एलयू) के द्वारा कराई गई जांच में भी सामने आई है। इस जांच के मुताबिक, निशीथ राय ने डॉ. शकुंतला मिश्रा पुर्नवास विश्‍वविद्यालय के कुलपति पद का कार्यभार ग्रहण करने के साथ ही रीजनल सेंटर फॉर अर्बन एंड एनवायर्नमेंटल स्टडीस के निदेशक पद पर भी अपनी सेवाएं दीं। आरके सिंह के मुताबिक, उनको विश्वविद्यालय के पद पर नियुक्ति देने से पहले एलयू के पद से त्याग पत्र देना चाहिए था।      

 

इस रिपोर्ट के आधार पर सीधे तौर पर यही जाहिर होता है कि प्रो. निशीथ राय का एक साथ दो-दो पदों पर कार्य करना नियम के विरुद्ध है।

कुछ ऐसा था समीकरण

गौरतलब है कि माननीय उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सक्सेना को जांच सौंपी गई थी लेकिन कुलपति के रसूख के आगे वह जांच शुरू नहीं कर सके। इससे नाराज शासन ने पूर्व में प्रमुख सचिव महेश कुमार गुप्ता द्वारा की गई प्रारंभिक जांच के आधार पर निशीथ राय पर कार्रवाई की लेकिन निशीथ राय हाईकोर्ट से स्थगनादेश ले जाए। राज्य सरकार ने मुकदमा लड़ा और आखिर में नवंबर माह के दूसरे पखवारे ने हाईकोर्ट ने प्रो. निशीथ राय की शक्तियां छीन लीं। अदालत ने प्रो. राय को रूटीन काम करने की परमिशन तो दे दी लेकिन नीतिगत निर्णय लेने पर पाबंदी लगा दी। अदालत ने राज्य सरकार को ये आदेश भी दिया की तीन महीने में सामान्य परिषद की बैठक करके आगे की कार्रवाई पूरी की जाए। इस बैठक में वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी शामिल होना था। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री की तरफ से समय भी दिया गया था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। इस बैठक को टाल जरूर दिया गया है लेकिन जल्द ही ये दोबारा होगी।

 

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प्रो. निशीथ राय द्वारा की गईं नियुक्तियां भी घेरे में

  • विश्वविद्यालय में प्रो. राय द्वारा कई नियुक्तियां की गईं लेकिन उनमें कमियां पाई गईं। इस संबंध में जांच समितियां भी बनी। 

  • विश्विद्यालय द्वारा भर्ती के लिए विज्ञापित पदों के सापेक्ष विज्ञापन में आरक्षण की स्थिति स्पष्ट नहीं की गईं थी।

  • इतिहास विभाग में प्रोफेसर पद पर अविनाश चन्द्र मिश्र एवं अंग्रेजी विभाग में एसोसियेट प्रोफेसर पद पर डॉ विपिन कुमार पाण्डेय की नियुक्ति में गड़बड़ियांकी गईं हैं। इन दोनों के द्वारा तथ्यों को छिपाकर नियुक्तियां प्राप्त की गईं हैं। प्रशासन द्वारा इनके खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं की गई है।

  • विश्वविद्यालय में विद्या परिषद् एवं कार्य परिषद के गठन होने के बावजूद विभिन्न बिन्दुओं पर अनुमोदन प्राप्त किये बिना कुलपति द्वारा अपने अधिकारों के बाहर जाकर शैक्षिक चयन में गड़बड़ियां की गईं।

  • सहायक कुलसचिव के पद पर भर्ती के विज्ञापन में पद की योग्यता व अर्हता में परिवर्तन किया गया और शासन द्वारा रोक लगाए जाने के बावजूद आनन-फानन में उसी दिन चयन की कार्यवाही पूर्ण कराकर चयनित अभ्यर्थी को कार्यभार ग्रहण कराया गया।

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