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एकेटीयू: परीक्षा या आवेदकों के साथ मजाक

Home | 10-Jan-2018 19:10:44 | Posted by - Admin

 

  • नियम-कानून तोड़कर एकेटीयू कुलपति पर अपनों को रेवड़ी बांटने का आरोप 

  • कुलपति के सियासी रसूख का फिर बजा डंका

  • 7000 आवेदकों की किस्मत और पैसे दोनों हुए बर्बाद

   
Frauds and Scams of AKTU Vice Chancellor Vinay Kumar Pathak

दि राइजिंग न्यूज़

लखनऊ।

 

डॉ. अब्दुल कलाम टेक्नीकल यूनिवर्सिटी (एकेटीयू) के कुलपति विनय कुमार पाठक के घोटालों की पोल एक के बाद एक खुलती ही जा रही है। विवि से सम्बद्ध विभिन्न पदों की नियुक्तियों में की गई धांधलेबाजी अब सबके सामने आ चुकी हैं। रातों-रात परीक्षा कराने के नियम बदले गए, परीक्षा कराने वाले जिम्मेदारों को बदला गया, यहां तक परीक्षा के तरीके भी बदल दिए गए। गोपनीयता और सुरक्षा के नाम पर बरती गई ढी़ला-ढा़ली घोटालेबाजों की मंशा को साफ़ स्पष्ट करती है। AKTU कुलपति विनय पाठक पर अब आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने वेरिफिकेशन और परीक्षा के नाम पर 7000 आवेदकों के साथ भद्दा मजाक किया है। आवेदकों के पैसे तो डूबे ही साथ ही उनकी शिक्षक बनने की उम्मीद भी टूट चुकी है। अब अभ्यार्थी एक-एक कर अदालत की शरण में जा रहे हैं।

 

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आपको बता दें कि असिस्‍टेंट प्रोफेसर के पद के लिए लगभग 7000 आवेदकों ने आवेदन भरा था, लेकिन आरोप के मुताबिक, कुलपति ने अपने लाभ के लिए व अपने चहेतों को नियुक्ति देने के लिए इन सभी आवेदनों को कचरे के डब्बे में डाल दिया।  इसी आक्रोश में लगभग 150 आवेदकों ने बीती 29 और 30 दिसंबर को लखनऊ के लक्षमण मेला मैदान को घेरा गया। विरोध कर रहे आवेदकों ने कुलपति पर कई इल्जाम लगाए और अपना ज्ञापन पत्र सिटी मजिस्ट्रेट अभिनव श्रीवास्तव को सौंपा। दि राइजिंग न्यूज़ ने जब इन लोगों से बात की तो चौंकाने वाले खुलासे सामने आए।

शुरुआत से आखिर तक कुछ यूं होता रहा खेल

नाम ना बताने की शर्त पर एक आवेदक ने बताया कि भर्ती के दौरान गाइड लाइन्स और सारे नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं। एक इंजीनियरिंग कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर के पद पर काम करने वाले अनुज (बदला हुआ नाम) ने बताया कि साल 2016 में विवि ने असिस्‍टेंट प्रो. पद की भर्तियों का विज्ञापन निकाला था। उन्हें पता चला कि सभी इंजीनियरिंग संस्थानों में इस पद पर नियुक्तियां निकलीं हैं। अनुज व अन्‍य कई आवेदकों ने सभी जगह के फॉर्म इस उम्‍मीद से भर दिए कि कहीं न कहीं हो जाए। उस वक्‍त यह प्रक्रिया पूर्णतया ऑफलाइन थी।

 

 

साल 2017 में इसे ऑनलाइन कर दिया गया। आनन-फानन में उन्होंने इसे भी पूरा कर दिया।  अनुज बताते हैं कि विज्ञापन में दरअसल चयन की कोई प्रक्रिया ही नहीं लिखी थी। खैर परीक्षा हुई। कुछ दिनों बाद अचानक से जिस संस्थान में ये पढ़ाते थे उनमे नई नियुक्तियां होने लगीं। पूछने पर पता चला कि ये नियुक्तियां असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुई हैं। अनुज ने सोचा कि परिणाम घोषित हो गए होंगे और संभवत: उनका सेलेक्‍शन नहीं हुआ होगा। इसके बाद उन्‍होंने वेबसाइट देखी तो न ही उसमें कोई रिजल्‍ट दिखे और न ही कोई नोटिस। यानी बिना परिणाम घोषित किए ही फर्जी नियुक्तियां हो गई।  

वेबसाइट-http://aktuup.cbtexam.in/AKTU-fsrec/HomePage.aspx

 

परीक्षा को बनाया मजाक-

अमित (बदला हुआ नाम) भी इस विरोध में शामिल थे। मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखने वाले अमित स्कूल में पढ़ाते थे। पीएचडी की डिग्री लेने के बाद उन्हें अपने एक मित्र से इस पद की जानकारी प्राप्त हुई। उन्होंने बताया लगभग 10 जगह के पदों की भर्तियां निकलीं थी। उन्हें भी यही लगा था की सब जगह अलग-अलग एग्जाम होंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्‍होंने कहा कि अलग-अलग फॉर्म भरवाकर एक ही परीक्षा करवाने का क्‍या अर्थ है। अमित ने बताया इस आवेदन की पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई पॉलिसी लागू नहीं हुई। कुलपति ने सब अपने मन-मुताबिक किया। उनका पूरा ध्यान बस एग्जाम कंडक्ट करवाने पर था, परिणाम तो उनको खुद ही बनाना था।

 

ये इस बात को भी पूछना चाहते हैं कि कुलपति महोदय ने किस हिसाब से शार्टलिस्टिंग कर नियुक्तियां कर लीं। उनका ये भी सवाल है कि जॉइंट एग्जाम कराना था तो अलग-अलग फॉर्म क्यों भरवाए गए और हमारे पैसों को बर्बाद कराया गया।

न फोटो न दस्‍तखत...ये कैसा एडमिट कार्ड

अविनाश (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि एग्जाम का एडमिट कार्ड सबसे अनोखा था। अमूमन एडमिट कार्ड में एक तरफ स्कैन की हुई अपलोडेड फोटो आती है और नीचे साइन। बगल में एक बॉक्स में आवेदक को पासपोर्ट साइज़ फोटो चिपकानी होती और उसके नीचे साइन करना होता है, लेकिन इस एडमिट कार्ड में बहुत से नए बदलाव देखने को मिले। एक ही बॉक्स था जिसमें आपको फोटो पेस्ट करनी थी और उसको सेल्फ अटेस्ट नहीं करना था। साथ इस सारी प्रक्रिया की भागदौड़ कुलपति जी ने अपने हाथों में ली ली थी लेकिन कार्ड पर उनका एक भी साइन नहीं था। ऑथोराइज सिग्नेटरी की जगह डॉ. केएस वर्मा का साइन था। अब अविनाश (बदला हुआ नाम) का सवाल ये है कि जब कुलपति के पास साइन करने की फुर्सत नहीं थी तो उन्होंने इतना भार अपने ऊपर लिया ही क्यों?

 

एग्जाम दिलाने का तरीका अकल्पनीय

अविनाश (बदला हुआ नाम) ने एग्जाम हॉल के अंदर का समीकरण समझाया तो पैरों तले जमीन खिसक गई। जब भी ऑनलाइन एग्जाम होता है तो परीक्षार्थी का पूरा वेरिफिकेशन होता है, सिस्टम पर रोल न. की पर्चियां चिपकाई जातीं हैं, सिस्टम को खोलने का पासवर्ड होता है और एक हॉल के अन्दर एग्जामिनेशन होता है लेकिन अविनाश के मुताबिक वहां इसके विपरीत माहौल था। चेकिंग के नाम पर खिलवाड़ हो रहा था। सबके कंप्यूटर का पासवर्ड एक था, कोई कहीं भी बैठे, कोई पूछने वाला नहीं था। एग्जाम हॉल में कोई वीडियोग्राफी नहीं हो रही थी, कौन एग्जाम देने आया कौन नहीं, किसी का कुछ अता-पता नहीं था। ना कोई थंभ इम्प्रैशन लिया गया और ना ही वेरिफिकेशन।

कुलपति की मंशा पहले से ही थी संदिग्ध

आरोप है कि विवि कुलपति विनय पाठक की मंशा पहले से ही ठीक नहीं थी। इससे पहले सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में भर्ती प्रक्रिया निदेशक की देख-रेख में होती थी लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी कुलपति ने इसमें हस्तक्षेप किया। सरकारी पेपर हमेशा से ही सरकारी संस्थान कराती लेकिन यहां तो मामला ही अलग था। कुलपति ने एनआइसी की बजाय परीक्षा कराने का ठेका प्राइवेट एजेंसी APTECH को दे दिया था। आपको बता दें ये वही एजेंसी है जिसने यूपी निर्माण निगम का पेपर कराया था जिसमे कई परीक्षार्थियों की आंसरशीट लगभग एक जैसी पाई गई थी।

 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन कॉपियों को निरस्त भी कर दिया था। अब सवाल ये उठता है कि जब इस एजेंसी पर दाग लग चुके हैं तो इसको इतना बड़ा कॉन्ट्रैक्ट क्यों दिया गया? अब इस बात से भी पर्दा हमारे कुलपति महोदय ही उठा सकते हैं।

                       

गौरतलब है कि ये सभी आवेदक इस वक्त बेरोजगार हैं क्योंकि इनके हक की नौकरी कुलपति के चहेतों को मिल चुकी हैं। पाई-पाई जोड़ कर इन सभी ने आवेदन पत्र भरे लेकिन बोलबाला सियासी रसूख का ही रहा। कुलपति जी ने एक बार फिर बता दिया कि वो जिसको चाहेंगे वही पद और कुर्सी प्राप्त करेगा। जो उनके लाभ देगा उसी को ही लाभ प्राप्त होगा।                                           

 

इसी तरीके से करते हैं धांधलेबाजी 

विनय पाठक पर आरोप हैं कि कुलपति पद पर रहते हुए उन्होंने उत्तराखंड यूनिवर्सिटी और कोटा ओपन यूनिवर्सिटी में अपने चहेतों को नौकरी बाटने के आरोप लगे हैं। इस संदर्भ में उनके खिलाफ कई शिकयातें की गईं लेकिन कुलपति के रसूख के आगे सब छोटे पड़ गए। कुलपति विनय पाठक पर ये भी आरोप हैं कि पारदर्शिता के नाम पर ये लिखित परीक्षा तो करा देते हैं लेकिन उससे पहले ये अपने चहेतों के बीच प्रश्नपत्र भी लीक कर देते। जब इनके खिलाफ कोई आवाज़ उठाता है तो उसे इनके सियासी रसूख का सामना करना पड़ता है।    

 

 

      

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