Rani Mukerji to Hoist the National flag at Melbourne Film Festival

दि राइजिंग न्यूज़

नई दिल्ली।

 

धर्मगुरू दलाई लामा ने भारत की प्राचीन सभ्यता की जमकर तारीफ की है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अगर भारत नैतिक शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ता है तो चीन उसके साथ चलेगा। उन्होंने कहा कि चीन की सरकार को तिब्बत सभ्यता और भाषा का आदर करना चाहिए।

 

उन्होंने भारतीय सभ्यता की तारीफ करते हुए कहा कि इस सभ्यता ने हमारे जीने का ढंग बदला है और हमें इससे शांति मिली है, इसलिए मैं भारतीयों को कहता हूं कि सभ्यता के हिसाब से वो गुरू हैं और हम चेला हैं। दलाई लामा ने कहा कि उन्होंने नागासाकी और हिरोसिमा समेत कई युद्ध पीड़ित क्षेत्रों का जायजा लिया, जहां उन्होंने पाया कि समस्या की शुरुआत सेना का प्रयोग करने से होती है।

इससे केवल नकारात्मक संदेश जाता है और युद्ध की संभावना प्रबल हो जाती है। यही नकारात्मक संदेश माता-पिता और उनके बच्चों में भी जाता है। हमें बातचीत के जरिये एक-दूसरे के साथ इस दुनिया में रहना होगा। भले ही हम इसे पसंद करें या न करें। हमें एक शांत समाज का निर्माण करना होगा।

 

जिसके लिए हमें सबसे पहले आत्मिक शांति और बुद्धिमत्ता को स्थापित करना होगा। उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का जिक्र करते हुए कहा कि अभी मैं 82 साल का हूं और कुछ सालों तक ही और एक्टिव रहूंगा लेकिन उसके बाद थोड़ा मुश्किल है। इसलिए नोबेल पुरस्कार विजेता होने के नाते मैंने ओबामा से कहा कि वह शांति और समरसता का प्रचार करेंगे। दलाई लामा ने कहा कि ओबामा ने मुझसे वादा किया कि वो भविष्य में इन बातों का प्रचार जरूर करेंगे।

भारत में अहिंसा का पढ़ाया जाता है पाठ

 

दलाई ने कहा कि हजारों सालों से अहिंसा का जो पाठ भारत में पढ़ाया जाता है, इसकी वजह से भारत पाकिस्तान से ज्यादा शांत देश है। पाकिस्तान में मुस्लिमों की संख्या बहुत है लेकिन भारत में उससे भी कहीं ज्यादा, फिर भी भारत में ज्यादा शांति है। जबकि दोनों ही जगहों के लोग कुरान पढ़ते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत में अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है।

 

उन्होंने कहा कि जब भी उनके जीवन में कठिनाइयां आईं हैं, भारत की प्राचीन शिक्षा ने उन्हें मानसिक शांति प्रदान की है। मैंने भारतीयों से जीना सीखा है। उन्होंने कहा कि गुस्सा और दया हमारी भावनाओं का हिस्सा हैं। सकारात्मक और अच्छे कर्मों द्वारा हम इन भावनाओं पर नियंत्रण कर सकते हैं।

समाधि और विपाशना जैसी 3 हजार पुरानी परंपरा के अभ्यास से हम इसे पा सकते हैं। क्योंकि शांत मन से शारीरिक हालत भी अच्छी रहती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि डर और तनाव हमारी सेहत पर बहुत बुरा असर डालते हैं।

 

उन्होंने कहा कि पश्चिमी संस्कृति ईश्वरीय परंपरा पर आधारित है जबकि भारतीय परंपरा में सांख्य दर्शन, वैदिक दर्शन, न्याय विद्यालय, मिमांसा परंपरा, चरवाका विद्यालय, जैन धर्म और बौद्ध धर्म और हाल ही में सिख धर्म, ब्रह्मा कुमार भी शामिल हैं।

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