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गायों की रक्षा के लिए देश में गो-क्रांति हो

Editorial | 8-Aug-2016 02:40:21 PM
     
  
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श्याम कुमार 

धर्म के वास्तविक स्वरूप पर जब कर्मकांड हावी हो जाता है तो धर्म को तो क्षति पहुंचती ही है, समाज का भी बहुत नुकसान होता है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नकली गो-रक्षकों पर कड़ा प्रहार कर बहुत उचित किया। उन्होंने ठीक कहा है कि गाय-रक्षा के नाम पर सड़कों पर उत्पात मचाने वाले ये लोग उन हजारों गायों की चिंता नहीं करते, जो सड़कों पर कूड़े के ढेर में पड़ी पन्नियां खा लेने से मौत का षिकार हो रही हैं। जो गायें दूध देना बंद कर देती हैं, उन्हें सड़कों पर आवारा छोड़ दिया जाता है या वे कसाइयों के हवाले हो जाती हैं। ऐसे भी उदाहरण सुनने को मिले हैं कि गो-रक्षा का दंभ भरने वाले अनेक लोगों की कसाइयों से भीतरी साठगांठ रहती है। गत दिवस एक टीवी चैनल ने जयपुर में शासन द्वारा संचालित हिंगोनिया गोशाला में गायों की दुर्दशा के जो दृश्य दिखाए, उन्हें देखकर दिल दहल उठा। गोशाला में तमाम गायें वहां भरे दलदल में धंसी हुई छटपटा रही थीं और उठ नहीं पा रही थीं। गोशाला में गायों के लिए चारा नहीं था। वहां काफी दिनों से गोबर नहीं उठाया गया था, जिससे चारों ओर गंदगी भरी हुई थी। उसी में मरी गायें भी पड़ी थीं। पता लगा कि उस गोषाला की व्यवस्था के लिए दो करोड़ रुपये प्रतिमास का बजट निर्धारित है, किन्तु भ्रष्टाचार उसे निगल लेता है। वहां पहले 266 कर्मचारी काम करते थे, किन्तु वेतन न मिलने के कारण सब छोड़ते गए। अब वहां केवल 22 कर्मचारी बचे हैं। इसके विपरीत हिंगोनिया गोशाला में मात्र 200 गायों के लिए स्थान है, लेकिन वहां 800 गायें रखी गई हैं।


गोशाला का संचालन करने वाले सरकारी कार्मिकों ने तर्क दिया कि बरसात के कारण वहां दलदल हो गया है। चूंकि हमारे यहां दण्ड का कोई भय नहीं है, इसलिए अधिकारी व कर्मचारी इस प्रकार के बेसिरपैर के तर्क दिया करते हैं। उनकी बात मानी जाए तो बरसात के चार महीनों में गोषाला में दलदल बना रहेगा। उन अधिकारियों एवं कर्मचारियों से पूछा जाना चाहिए कि हर महीने 200 करोड़ रुपये का बजट सरकार क्या उन्हें अपनी तिजोरी भरने के लिए देती है? गोशाला में व्याप्त दुर्दशा के कारण वहां नित्य लगभग 40 गायों की जो मौत हो रही है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? राजस्थान ही नहीं पूरे देश की, विशेष रूप से उत्तर भारत की नौकरशाही का यही हाल है। अधिकांश नौकरशाही कामचोर एवं भ्रष्ट है। वह कठोर दण्ड पाए बिना नहीं सुधर सकती। उसे सुधारने का एकमात्र उपाय है कि जो काम में गफलत करे, उसे तत्काल नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाए। हिंगोनिया गोषाला की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों को कुछ दिन वहां के नारकीय वातावरण में रहने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। जीटीवी पर जब उस गोषाला की ह्रदयविदारक दुर्दशा दिखाई गई और न्यायालय ने उस पर कड़ा रुख अपनाया तो दलदल में धंसी गायों को जल्दी-जल्दी बाहर निकाला जाने लगा तथा मरी हुई गायों को वहां से हटा दिया गया। रेत-मिट्टी आदि डालकर दलदल को ठीक किया जाने लगा। लेकिन प्रश्‍न है कि वहां जो हजारों गायें नरक भोगकर मर चुकी हैं, उनका जीवन कैसे लौटेगा? उन हजारों गायों की हत्या के आरोप में क्या नौकरशाहों को जेल भेजा जाएगा? अभी तो केवल नगर निगम के उपायुक्त एवं गोशाला के प्रभारी को लापरवाही के आरोप में निलम्बित किया गया है। किन्तु यह पर्याप्त नहीं है। उन्हें व अन्य अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए। नगर निगम के आयुक्त को भी कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए। स्वायत्त शासन मंत्री एवं पशुपालन मंत्री को मंत्रिमण्डल से हटा दिया जाना चाहिए। पशुपालन मंत्री के निकम्मेपन का इसी से पता लगता है कि उन्हें सरकारी गोशाला में गायों की दुर्दषा का ज्ञान नहीं था तथा जब टीवी पर शोर मचा व न्यायालय ने कड़ा कदम उठाया, तब वह वहां निरीक्षण करने गए। 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में फैले गो-रक्षकों को कड़ी फटकार लगाते हुए सही कहा कि ये फर्जी गो-भक्त रात में आपराधिक कृत्य करते हैं तथा दिन में गो-रक्षक का रूप धारण कर उत्पात मचाते हैं। हमारे देश में कुल 19 करोड़ गायें हैं तथा दुग्ध-उत्पादन में भारत विश्‍व में प्रथम स्थान पर है। ऐसी स्थिति तब है, जबकि हमारे यहां गायों के संरक्षण, पोषण एवं संवर्धन के लिए कुछ भी नहीं किया जाता है। यदि इन तीन बातों पर सरकारें ध्यान दें एवं कारगर कदम उठाएं तो भारत सम्पूर्ण विश्व में दुग्ध-क्रांति ला सकता है। हमारे यहां भैंस पालने का रिवाज बहुत बढ़ गया है तथा भैंस का दूध अधिक बिक रहा है, लेकिन विदेशों में भैंस के दूध का कोई महत्व नहीं है। वहां गाय के दूध को ही वास्तविक दूध माना जाता है तथा गायों को बड़े वैज्ञानिक ढंग से रखा जाता है।


मोदी सरकार को चाहिए कि वह गो-पालन को बढ़ावा देने का जबरदस्त अभियान शुरू करे, ताकि देश में गो-क्रांति का आगाज हो। गाय भारतीय संस्कृति का प्रतीक है तथा देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रही है। हमारे गांवों की पहचान के प्रतीक रहे हैं-गाय, बैल, तालाब व नीम। गो-रक्षा महात्मा गांधी का परमप्रिय विषय रहा है। नरेंद्र मोदी ने बताया कि जब वह गुजरात में मुख्यमंत्री थे तो ऐसे शिविर लगवाया करते थे, जहां गायों का ऑपरेशन कर पेट से पन्नियां निकाली जाती थीं। एक बार तो एक गाय के पेट से दो बाल्टी पन्नी निकली थी। इस प्रकार के शिविर देशभर में जगह-जगह लगाए जाने चाहिए। इस बात का कारगर उपाय किया जाना चाहिए कि गाय पन्नियां न खाने पाएं। गायों के रहने व खाने के लिए देशभर में श्रेष्ठ स्तर की गोशालाएं बनवाई जानी चाहिए तथा गायों के चरने के लिए बड़े-बड़े चारागाह भी बनाए जाएं।



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