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मायावती की साजिश थी कांशीराम की मौत : पुनिया
   -राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने बसपा सुप्रीमो पर लगाए       गंभीर आरोप

   -बसपा को बताया डूबता जहाज, बोले- कूद-कूदकर भागने वाले ही तलाशते थे मोटी            रकम देने वाली मुर्गी



खरी-खरी

  दि राइजिंग न्यूज

कमल दुबे

पीएल पुनिया वर्तमान में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति के अध्यक्ष हैं। यूपी से राज्यसभा के सांसद हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा की अपनी पारी दस साल पहले पूरा करने के बाद सियासत के नक्शे पर नई पटकथा लिख रहे हैं। पीएल पुनिया जब सरकारी सेवा में थे तो उनकी गिनती‍ कांशीराम और मायावती के वफादार अफसरों में थी। जब बसपा सरकार बनीं तो कांशीराम ने मायावती के साथ पीएल पुनिया को लगाया था। कभी बसपा सरकार के हर छोटे-बड़े फैसले में पीएल पुनिया की अहम भूमिका थी। कहा तो यह जाता है कि कांशीराम और मायावती के बारे में वह सब कुछ जानते हैं। बावजूद इसके उन्होंने अपनी सियासी पारी के लिए कांग्रेस का प्लेटफार्म चुना। अब जब कांशीराम के तमाम वफादार मायावती का साथ छोड़कर भाग रहे हैं और बसपा में राजनीतिक तूफान उठा है, ऐसे में यूपी की राजनीति में आने वाला बदलाव और कांशीराम के मिशन को लेकर  दि राइजिंग न्यूज के साथ पीएल पुनिया की लंबी बातचीत हुई। करीब डेढ़ घंटे चले सवाल-जवाब के दौरान विभिन्न बिन्दुओं पर खुलकर बोले और कई चौंकाने वाली बातों का खुलासा किया। आइए जानते हैं क्या हैं वे गंभीर खुलासे-


आप तो मायावती को काफी करीब से जानते हैं। बसपा छोड़ने वाला हर कोई उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाता है, असली माजरा क्या है?

भ्रष्ट तो वह शुरू से ही थीं। रिक्शा चलाने वाला भी जानता है कि बसपा में चुनाव का टिकट कैसे मिलता है। मुलाकात करने से लेकर जन्मदिन और चुनाव में टिकटों की नीलामी सहित हर छोटे-बड़े काम का मायावती के यहां रेट तय है। पहले ये दाम लाखों में था जो अब करोड़ों में जा पहुंचा है। अचानक नेताओं के बसपा छोड़ने की असली वजह तो कुछ और है। सारे के सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। जो लोग बसपा को छोड़ रहे हैं वही मायावती के लिए मोटी रकम देने वाली मुर्गी को ढूंढकर लाया करते थे।


आप जब मायावती के करीबी थे तो धन बटोरने के खेल में किस भूमिका में हुआ करते थे ?

मैं जानता तो सब था लेकिन सरकार के किसी मंत्री और अधिकारी की मेरी नजरों के सामने की इस तरह का कार्य करने की हिम्मत नहीं होती थी। मुख्यमंत्री का प्रमुख सचिव होने के नाते मेरा ज्यादातर समय मायावती के साथ बीतता था। बाबू सिंह कुशवाहा या फिर उनके जैसे मेरे हटने का इंतजार करते थे ताकि पैसों के लेनदेन पर बात की जा सके । एक घटना का जिक्र करते हुए पुनिया कहते हैं कि बिजली उत्पादन का एक प्रोजेक्ट लगाने के लिए बिड़ला ग्रुप की बैठक मायावती के साथ थी। ग्रुप के अधिकारियों को सतर्क करते हुए मैंने कहा था कि अन्दर जो भी डिमाण्ड हो वहीं पर निपटा लेना मुझसे कोई मतलब नहीं है। बिड़ला ग्रुप के अधिकारियों से प्रोजेक्ट लगाने के बदले मोटी रकम मांगी गई और हिदायत दी गई कि अगर प्रोजेक्ट लगाना है ‍तो पुनिया के साथ आने की जरूरत नहीं है। अगली बार शम्भूनाथ के साथ आना।  


बसपा में हाल के घटनाक्रम को आप किस रूप में देखते हैं?

देखिए, मायावती का खेल तो खत्म हो चुका है। उन्हें लगता था कि सत्ता प्लेट में रखकर परोसी गई है। बसपा में जिस तरह की बगावत है उससे यही लगता है कि जहाज डूबने वाला है और चूहे कूद-कूदकर भाग रहे हैं।  


डाक्टर भीमराव अम्बेडकर और कांशीराम के मिशन को क्या मायावती नीलाम कर रही हैं?

अम्बेडकर और कांशीराम के विचारों में काफी मेल था। दोनों की नजर में सत्ता सामाजिक परिवर्तन की कुंजी थी। छब्बीस नवम्बर 1949 में संविधान सभा की आखिरी चर्चा में डाक्टर अम्बेडकर ने कहा था कि गैर बराबरी खत्म नहीं हुई तो आने वाले समय में संवैधानिक व्यवस्था खत्म हो जाएगी। मायावती ने इसके विपरीत समाजिक परिवर्तन का मकसद खोलकर सत्ता को धन कमाने की कुंजी समझ लिया।


आपने तो कांशीराम और मायावती को काफी करीब से देखा है, कांशीराम की मौत क्या स्वभाविक थी या फिर कुछ और ?

सच कहूं तो कांशीराम के इलाज के समय और मरने के बाद मायावती ने जो कुछ किया उससे मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि कांशीराम की मौत के पीछे मायावती की गहरी साजिश थी। कांशीराम बहुत बीमार नहीं थे और ठीक होने के लिए अस्पताल में भर्ती कराये गए थे जहां पर उन्हें पूरी तरह ठीक कर दिया गया। इलाज के दौरान मायावती ने उन्हें पूरी तरह अपने कब्जे में ले रखा था। परिवार के सदस्यों तथा अन्य किसी को मिलने की इजाजत नहीं थी।


मायावती का हाथ होने की बात इतने पुख्ता तरीके से कैसे कह रहे हैं?

जिस दिन कांशीराम की मौत हुई उसी दिन मैं सुबह की फ्लाइट से दिल्ली से लखनऊ लौटा था। लखनऊ एयरपोर्ट पर जानकारी मिलने पर मैं वापस दिल्ली पहुंचा और गुरुद्वारा रकाबगंज में कांशीराम के पार्थिव शरीर को रखे जाने का इंतजाम करने लगा। महान दलित नेता के अंतिम दर्शन के लिए देश-विदेश से आने वाले लोगों को ध्यान में रखकर पार्थिव शरीर को कम से कम दो दिन रखे जाने की जरूरत थी लेकिन 12 बजे से लेकर 4 बजे तक ही पार्थिव शरीर को दर्शनार्थ रखे जाने का निर्देश था। निर्धारित कार्यक्रम के विपरीत उस दिन साढ़े ग्यारह बजे ही पार्थिव शरीर गुरुद्वारा रकाबगंज लाया गया। पार्थिव शरीर आने के कुछ ही समय बाद मायावती को शव का पोस्टमार्टम कराये जाने की खबर मिली। इसके बाद वह बौखला हो उठीं और फिर मायावती ने महज डेढ़ घंटे के अन्दर आनन-फानन में अंतिम संस्कार करा दिया। न जाने क्यों मायावती उनके शव का पोस्टमार्टम कराने से घबरा रही थीं।


दलितों को रिझाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा ने जोर लगा रखा है। कितने सफल होंगे?

मोदी जी बात करने में बड़े चतुर हैं, इसमें उन्हें कोई मात नहीं दे सकता। दलित महापुरुषों की शरण में जाकर उन्हें बार-बार आरक्षण न खत्म करने की बात कहनी पड़ रही है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आखिर आरक्षण को खत्म करने की बात उठ कहां से रही है। वैसे स्पष्ट करना चाहता हूं कि आरक्षण से दलितों का भला होने वाला नहीं है क्योंकि जब सरकारी क्षेत्र में नौकरियां ही नहीं बचेंगी तो फिर आरक्षण से क्या फायदा। अगर मोदी जी वाकई दलितों के लिए कुछ करना चाहते हैं तो प्रोन्नति में आरक्षण दें। संविधान के आर्टिकल 312 में संशोधन करके ज्यूडिशियरी में आरक्षण तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का कानून बनाएं। इसके अलावा स्पेशल कम्पोनेंट प्लान की धनराशि का डायवर्जन रोकने के लिए कानून बनाने का काम करें।


बसपा का अगर दलित वोट बिखरता है तो किसे फायदा होगा?

दलित वोटर हमेशा से कांग्रेस के साथ रहा है। अगर यूपी को छोड़ दें तो अन्य राज्यों में दलित आज भी कांग्रेस के साथ हैं। यूपी में तो 1985 के बाद बसपा ने सुनियोजित तरीके से अभियान चलाकर कांग्रेस का दलितों वोट तोड़ा है। अगर उस समय सतर्कता बरती गई होती तो कांग्रेस से दलित कभी नहीं टूटता। वजह 20 सूत्रीय कार्यक्रम में ग्राम समाज और सीलिंग की जमीनें दलितों को बांटने, शिक्षा के लिए वजीफा की व्यवस्था बैकों का राष्ट्रीयकरण करके दलित और गरीबों के लिए कर्ज का रास्ता खोलने का कार्य कांग्रेस ने ही किया है। सपा तो खुले रूप से दलित विरोधी है और बसपा ने उन्हें ठगा है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसे दलित की बीमारी का पता नहीं है। ऐसे में वह इलाज क्या करेगी।


विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस का रोडमैप तैयार कर रहे प्रशांत किशोर (पी.के) के बारे में आप का क्या नजरिया है?

वह अनुभवी व्यक्ति हैं और बड़े ही अच्छे तरीके से वह काम कर रहे हैं। जमीनी स्तर का फीडबैक आने के बाद रोडमैप पर काम चल रहा है। उनकी रणनीति का निश्चित रूप से पार्टी को फायदा होगा।


कांग्रेस में प्रियंका की जरूरत तथा राहुल गांधी के बारे में आपकी क्या सोच है?

कांग्रेस में राहुल गांधी का एकदम अलग रोल है। वह पीएम पद के दावेदार हैं और अगली बार कांग्रेस सरकार में पीएम बनेंगे जबकि प्रियंका गांधी का रोल अमेठी और रायबरेली में पूरी तरह निर्धारित है। इस बार प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने दोनों क्षेत्रों से बाहर प्रियंका गांधी के चुनाव प्रचार की पहल की है। श्री आजाद पार्टी के बड़े ही अनुभवी नेता हैं और निश्चित रूप से उनकी यह पहल स्वागत करने योग्य है।          

   

 

 

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