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निजी अस्‍पतालों पर कसनी है लगाम

  • जननी सुरक्षा योजना की प्रोत्साहन धनराशि को आधार लिंक्ड
  • सूबे की 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं खून की कमी का शिकार



 


दि राइजिंग न्‍यूज

सूबे के स्‍वास्‍थ्‍य महकमें के सबसे बड़े अधिकारी प्रमुख सचिव स्‍वास्‍थ्‍य अरुण कुमार सिन्‍हा के सामने पिछले दिनों डेंगू सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया। इस बीमारी पर काबू पाने की कोशिश करते हुए सिन्‍हा की न केवल कोर्ट में पेशी हुई बल्कि इस बीमारी से मरने वालों के संदिग्‍ध आंकड़ों पर उन्‍हें और उनके अधिकारियों को अदालत की फटकार भी खानी पड़ी।


वैसे प्रमुख सचिव स्‍वास्‍थ्‍य के सामने डेंगू और चिकनगुनिया से निपटने के साथ-साथ उन योजनाओं को प्रभावित नहीं होने देना है जो जनस्‍वास्‍थ्‍य स्रे जुड़ी हैं। ऐसे माहौल में हमने भी तमाम मुदृों, योजनाओं, रणनीतियों को लेकर प्रमुख चिकित्‍सा स्‍वास्‍थ्‍य अरुण कुमार सिन्‍हा से खरी-खरी बातचीत की।

 

डेंगू की बीमारी से काफी जानें गईं, ताजा हालात क्‍या हैं?

अभी तो स्थिति काफी नियंत्रण में हैं, मौसम ने भी साथ दिया है, लेकिन मैं अब भी कहूंगा इस मामले में डेंगू के आंकड़े बढ़चढ़ कर सार्वजनिक होते रहे।

 

किसने इन आंकड़ों को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया?

निजी चिकित्‍सालयों और जांच केन्‍द्रों ने डेंगू का हौव्‍वा ज्‍यादा कर दिया, खून की जांच में प्‍लेटलेट्स कम होने का मतलब डेंगू नहीं होता, लेकिन प्‍लेटलेट्स के ही कम आने पर लोग डेंगू-डेंगू करने लगे।

 

डेंगू के नाम पर डराने वाले ऐसे प्राइवेट चिकित्‍सा संस्‍थानों पर कार्रवाई की गई?

हमने जब खून की जांच सहित अन्‍य पैथालॉजिकल जाचों के आंकड़े प्राईवेट जांच केन्‍द्रों और अस्‍पतालों से मांगने शुरू किए तो कई आशंकाएं साफ हो गईं। जिन मरीजों में बुखार की वजह से प्‍लेटलेट़स में कमी थी उनका भी इलाज डेंगू दिखाकर किया जा रहा था। ऐसे अस्‍पातालों की लिस्‍ट अब हमारे पास है जिनको नोटिस भेजी जा रही है।

 

इस मामले में कोर्ट ने काफी सख्‍ती दिखाई, बाद में आपने क्‍या किया?

हमने इस मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की है। आधा दर्जन से ज्‍यादा स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के अधिकारियों पर निलंबन और ट्रांसफर की कार्यवाही की गई है। इस बावत कोर्ट को भी सूचित कर दिया गया है।

 

अभी ताजा प्रयास स्‍वास्‍थ्‍य महकमा किस दिशा में कर रहा है?

भारत सरकार ने एक जनवरी 2017 से जननी सुरक्षा योजना की प्रोत्साहन धनराशि प्राप्त करने के लिए प्रत्येक लाभार्थी का आधार लिंक्ड बैंक खाता अनिवार्य कर दिया है। इसकी जानकारी एएनएम, आंगनवाड़ी व आशा बहुओं के माध्‍यम से प्रत्‍येक गर्भवती महिला तक पहुंचाने की हरसंभव कोशिश की जा रही है।

 

वैसे हमारे राज्‍य में गर्भवती महिलाओं के लिए आजादी के साठ बरसों के बाद भी चिकित्‍सा व्‍यवस्‍था संतोषजनक नहीं है?

सुधार निरन्‍तर हो रहा है। मैं आपको जानकारी दे दूं कि यूपी में  50 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया यानि खून की कमी से पीड़ित हैं जो मातृ मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है।

 

गर्भवतियों की असमय मौत के और क्‍या कारण है?

इसके अलावा हाई-ब्‍लड-प्रेशर एवं पहले से हुई बीमारियों की समय से पहचान न होना भी मातृ मृत्यु को बढ़ाता है।

 

आपका महकमा क्‍या कर रहा है इस दिशा में?

गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल और संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहन देना ही मुख्य है। प्रदेश में गत 10 वर्षों से जननी सुरक्षा कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिसके फलस्वरूप संस्थागत प्रसव 17 प्रतिशत से बढ़कर 68 प्रतिशत हो गए हैं।

 

आज भी गांवों लोग घरों में ही दाईयों के माध्‍यम से प्रसव को अंजाम दे रहे हैं?

हां, अभी भी 30 प्रतिशत से अधिक घरेलू प्रसव हो रहे हैं। जिसको ख़त्म करने के लिए प्रत्येक गर्भवती महिला को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़कर संस्थागत प्रसव के लिए जागरूक करना आवश्यक है।

 

हम देख रहे हैं कि स्‍वास्‍थ्‍यमंत्री रोजाना ही राजधानी के किसी न किसी अस्‍पताल का दौरा कर खामियां उजागर कर रहे हैं?

हां, हमारे मंत्रियों का यह प्रयास अच्‍छा है, फर्क पड़ता है इससे...उनकी रिपोर्ट पर हर खामियों को शत-प्रतिशत दूर करने की हामरी कोशिश है।

 

किस तरह की खामियां स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के लिए ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है?

बेड की कमी को लेकर, साफ-सफाई, आवश्‍यक दवाओं और जांच मशीनों की खराबियों की खामियां तो अलग है, लेकिन हम चाहते हैं कि सरकारी डॉक्‍टर एक तो समय के पाबंद हों और मरीजों के साथ सहानुभूतिपूर्वक व्‍यवहार करें यही प्राथमिकता है।

 

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