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जय कालिका… आजमगढ़ के चूल्‍हे का स्‍वाद



 


दि राइजिंग न्‍यूज

आउटपुट डेस्‍क, लखनऊ।

आज की व्‍यस्‍ततम शहरी जीवनशैली में कहीं न कहीं हम अपनी नींव भूलते जा रहे हैं। भूलते जा रहे हैं कि हम गांव से ताल्‍लुक रखते हैं। इस ग्रामीण परिवेश को लौटाने की एक छोटी सी कोशिश की है आजमगढ़ के रहने वाले अमन सिंह ने। जय कालिका रेस्‍त्रां इसी पहल का नतीजा है। इस रेस्‍त्रां की खास बात है कि यहां खाना पकाने के लिए गैस की जगह चूल्‍हे का प्रयोग किया जाता है।


जय कालिका की कहानी, अमन की जुबानी...

मैं करीब आठ साल पहले यानि 2008 में लखनऊ आया था। यहां मैंने देखा कि लोगों को खाना बहुत पसंद है। नवाबों का गढ़ है तो नॉन वेज के शौकीनों की भी कमी नहीं थी। खाना पकाने में मुझे वैसे भी बहुत रुचि थी। तो बस, मैंने ठान ली, कि अपना फूड व्‍यापार यहीं से शुरू करूंगा।


मैं बखूबी जानता था कि लखनऊ में रेस्‍त्रां की कमी नहीं है। इसलिए मैंने पूर्वांचल की तर्ज पर इस प्रोजेक्‍ट को शुरू करने का मन बनाया। यानि, सब कुछ चूल्‍हे पर पकाना। यहां त‍क कि रोटियां भी। मैंने सोच लिया कि बस अब इसी राह चलना है। मैं चाहता था कि रेस्‍टोरेंट को स्‍टूडेंट्स पर फोकस करूं। इसलिए दाम भी कम ही रखे। मैंने यहां वेज खाना भी रखा है।


किसी ने भरोसा नहीं किया

शुरुआत में मुझे बहुत डिमोरोलाइज किया गया। दोस्‍तों को मेरे प्रोजेक्‍ट पर भरोसा नहीं था। कई लोगों ने मुझे मना किया। ईश्‍वर का शुक्र है कि कुछ दोस्‍त अच्‍छे भी मिले, जिन्‍हें मेरी काबिलियत पर भरोसा था। परिवार से बहुत सपोर्ट मिला। हालांकि जो रिस्‍पांस मैं एक्‍सपेक्‍ट कर रहा था वो अभी नहीं मिला है। लेकिन ये तो स्‍टार्टअप है, थोड़ा समय लगता है। मेरी मेहनत में कोई कमी नहीं है। काम अच्‍छा चला तो दो माह में लखनऊ में ही अगली ब्रांच खोलूंगा। अपने गृहक्षेत्र में भी इसी की चेन खोलने का मन है।

 

इसलिए जय कालिका है हटके

यहां सब्‍जी-रोटी से लेकर हर चीज चूल्‍हे पर बनती है। गैस का कोई प्रयोग नहीं होता। भोजन बनाने वाले बर्तन बेहद पारंपरिक हैं। नॉनवेज व वेज दोनों उपलब्‍ध हैं। थालियों में खाना परोसा जाता है।


यह है मेन्‍यू में खास

मटन दो प्‍याजा, कलेजी मसाला, चिकन दो प्‍याजा, एग करी, टिक्‍का, कोरमा, दाल फ्राई, पनीर दो प्‍याजा, मिक्‍स वेज...और भी बहुत कुछ।



 

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