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दलित सीएम उम्‍मीदवार से पूर्ण बहुमत

  • मायावती को केवल अपनी फिक्र दलितों की नहीं
  • आरक्षण के आज के दौर में समीक्षा जरूरी



 

अजय दयाल

16 जुलाई, लखनऊ।


2017 में होने जा रहे यूपी विधानसभा चुनाव के मद़देनजर इन दिनों दलित एजेंडे को धार देने में जुटी भारतीय जनता पार्टी के सांसद कौशल किशोर का कहना है कि अगर हाईकमान यूपी में किसी दलित को बतौर मुख्‍यमंत्री प्रोजेक्‍ट करे तो यहां बहुमत की सरकार बनने से हमें कोई नहीं रोक सकता। मोहनलालगंज, लखनऊ के सांसद कौशल किशोर इन दिनों देश-प्रदेश के सरकारी विभागों में कार्यरत संविदाकर्मियों के साथ खड़े होकर उनकी आवाज को बुलंद कर रहे हैं। असल में कौशल किशोर की मंशा देशभर के दलित समाज को एकजुट करने की है। इन दिनों उनकी राजनीतिक गणित इसी जोड़-घटाने को लेकर चल रही है। इसी मुद्दे पर दि राइजिंग न्‍यूज के खरी-खरी कॉलम के तहत उन्‍होंने अपनी बेबाक बातचीत में दलित एजेंडे को धार देने के प्रयासों को सामने रखा-


भाजपा तो दलित-ब्राह़मण गठजोड़ की सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही है, क्‍या कहना चाहेंगे ?

मैं तो कहूंगा, अगर हाईकमान उत्‍तर प्रदेश में किसी दलित नेता को बतौर सीएम प्रोजेक्‍ट करे तो यहां बहुमत की सरकार बनने से हमें कोई नहीं रोक सकता। कांग्रेस की ताजी पहल के बाद अब ऐसा करना हमारे लिए फायदेमंद होगा।


मौजूदा समय में आप किस एजेंडे पर काम कर रहे हैं ?

प्रदेशभर के तमाम सरकारी विभागों में लगभग 17 लाख संविदाकर्मी कार्यरत हैं। इनकी अनदेखी की जा रही है। न तो मानदेय संतोषजनक है और न ही इन्‍हें नौकरी की मुख्यधारा में लाया जा रहा है। मैं इन्हीं की आवाज इन दिनों बुलंद कर रहा हूं।

 

क्या इसका कोई राजनीतिक लाभ मिलेगा ?

मेरे इस संघर्ष का पार्टी (बीजेपी) को अवश्य लाभ मिलेगा...मेरा लक्ष्य तो देशभर के लगभग एक करोड़ संविदाकर्मियों को एकजुट करने का है।

 

इन्हें क्या आप वोटबैंक मानकर चल रहे हैं ? 

क्यों नहीं, आंगनबाड़ी, चौकीदार, शिक्षामित्र, रोजगार सेवक, रसोइयां, आशाबहुएं...यही नहीं अकेले रोडवेज विभाग में 37 हजार संविदाकर्मी हैं। इन सभी की लड़ाई मैं ईमानदारी से लड़ रहा हूं।


मायावती का दलित एजेंडा कितना कारगर रहेगा ?

मायावती का किसी एजेंडे से मतलब नहीं है। वे केवल पैसे को ही अपना एजेंडा मानती हैं। उनकी करतूतों को प्रदेश का दलित समजा जानता है। लोकसभा चुनावों में उनको दलितों को वोट नहीं मिला है। अब तो उनके नजदीकी भी उनसे दूरी बना रहे हैं। ऐसे में दलित बिरादरी उनके साथ नहीं जाएगी। वैसे भी वे दलितों का भला कहां करती हैं बल्कि दलितों के नाम पर वे अपना भला करती हैं।


केशव मौर्य के भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनने का क्या साकारात्मक प्रभाव पड़ा ?

केशव मौर्य काफी सक्रिय और जमीन से जुड़े नेता हैं। उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने से यूपी का एक बड़ा दलित एवं पिछड़ा वोटबैंक बीजेपी की ओर डायवर्ट हुआ है। 

 

आने वाले यूपी के विधानसभा चुनाव में किन दलों के बीच कांटे की टक्कर आप मानते हैं ?

यूपी में इस बार भाजपा और बसपा के बीच सीधी टक्कर है।

 

...तो क्या कांग्रेस का पीके फार्मूला और मौजूदा सरकार के कार्यों का कोई राजनीतिक लाभ उनके दलों को नहीं मिलेगा ?

पीके फार्मूला तो अधारहीन है, यूपी में नहीं चलने वाला, रही बात समाजवादी पार्टी की तो उनकी सरकार में किसानों की उपेक्षा के साथ-साथ कानून व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है, जनता सब समझती है। 

 

आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यूपी में बीजेपी इस बार दलित एजेंडे को धार देने में लगी है, ऐसे में आरएसएस की भूमिका क्या हैं ?

संघ जातिवाद के खिलाफ है, संघ का उद्देश्य हिंदुओं को यूनाइट करना है जिसमें दलित भी आते हैं। सच पूछिए तो संघ दलितों को लेकर काफी संवेदनशील है।

 

आरक्षण पर क्या कहेंगे ?

आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। आरक्षण का अर्थ सर्वसमाज की मुख्यधारा में भागीदारी से होना चाहिए।


 

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