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दि राइजिंग न्यूज़

आउटपुट डेस्क।

 

अधिकतर लोग अघोर साधना व तंत्र साधना को समान समझते हैं, लेकिन दोनों में काफी अंतर होता है। तंत्र साधना में मुख्य रूप से तंत्र मंत्र और यंत्र का प्रयोग होता है और इन तीनों में तंत्र सबसे पहले आता है। तंत्र एक ऐसी रहस्यमयी विद्या है जिसका प्रचलन हिंदुओं के अलावा जैन और बौद्ध धर्म में भी है।

तंत्र साधना से जुडी कुछ बातें...

 

  • वाराही तंत्र के अनुसार तंत्र के नौ लाख श्लोकों में से एक लाख श्लोक भारत में हैं। तंत्र साहित्य विस्मृति के चलते विनाश और उपेक्षा का शिकार हो गया है। अब तंत्र शास्त्र के अनेक ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं। वर्तमान में 199 तंत्र ग्रंथ हैं। तंत्र का विस्तार ईसा पूर्व से तेरहवीं शताब्दी तक बड़े प्रभावशाली तक बड़े प्रभावशाली रूप से भारत, चीन, तिब्बत, थाईलैंड, मंगोलिया, कम्बोज, आदि देशों में रहा।

  • तंत्र मुख्य रूप से दो तरह का होता है, वाम तंत्र और दूसरा सौम्य तंत्र। वाम तंत्र में पंच मकार– मध, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन साधना में उपयोग लाए जाते हैं। जबकि सौम्य तंत्र में सामान्य पूजन पाठ व अनुष्ठान किए जाते हैं।

  • तंत्र एक रहस्यमयी विधा हैं। इसके माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्मशक्ति का विकास करके कई तरह की शक्तियों से संपन्न हो सकता है। यही तंत्र का उद्देश्य हैं। इसी तरह तंत्र से ही सम्मोहन, त्राटक, त्रिकाल, इंद्रजाल, परा, अपरा और प्राण विधा का जन्म हुआ है।

  • तंत्र से वशीकरण, मोहन, विदेश्वण, उच्चाटन, मारण और स्तम्भन मुख्यरूप से ये 6 क्रियाएं की जाती हैं जिनका अर्थ वश में करना, सम्मोहित करना, दो अति प्रेम करने वालों के बीच गलतफहमी पैदा करना, किसी के मन को चंचल करना, किसी को मारना, मन्त्रों के द्वारा कई घातक वस्तुओं से बचाव करना।

  • इसी तरह मनुष्य से पशु बन जाना, गायब हो जाना, एक साथ 5-5 रूप बना लेना, समुद्र को लांघ जाना, विशाल पर्वतों को उठाना, करोड़ों मील दूर के व्यक्ति को देख लेना व बात कर लेना जैसे अनेक कार्य ये सभी तंत्र की बदौलत ही संभव हैं।

  • तंत्र का गुरु महादेव को माना जाता है। उसके बाद भगवान दत्तात्रेय और बाद में सिद्ध योगी, नाथ व शाक्त परम्परा का प्रचलन रहा है। दत्तात्रेय के अलावा नारद, पिप्पलाद, परशुराम, सनकादि ऋषि आदि तंत्र को ही मानते थे।

  • तंत्र के माध्यम से ही प्राचीनकाल में घातक किस्म के हथियार बनाए जाते थे, जैसे पाशुपतास्त्र, नागपाश, ब्रह्मास्त्र आदि। जिसमें यंत्रों के स्थान पर मानव अंतराल में रहने वाली विधुत शक्ति को कुछ ऐसी विशेषता संपन्न बनाया जाता है जिससे प्रकृति से सूक्षम परमाणु उसी स्तिथि में परिणित हो जाते हैं।

 

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