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कश्‍मीरी बागीचे में बोया गया है हथियारों का बाजार

     
  
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  • कश्‍मीर समस्‍या के लिए हथियारों की खरीद फरोख्‍त ही जिम्‍मेदार

exclusive interview of ajeet kumar by the rising news


दि राइजिंग न्‍यूज

देश की कश्‍मीर समस्‍या किसी हिंदू मुसलमान की वजह से नहीं है। यदि कोई यह सोचता है तो वह बिलकुल गलत है। यह समस्‍या राजनीति की वजह से है। दूसरा बड़ा कारण ये है कि दुनिया भर के शक्तिशाली देश यह नहीं चाहते कि भारत-पाकिस्‍तान मिलकर इस समस्‍या का समाधान ढूंढ़ लें क्‍योंकि यह समस्‍या अभी बनी रहेगी, उनके हथियार पाकिस्‍तान और भारत जैसे देश खरीदते रहेंगे। वे इस समस्‍या को हथियारों का बाजार के रूप में देख रहे हैं। इसी कारण से भारत समेत आधी दुनिया में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा किए गए हैं। एशिया से लेकर यूरोप तक सारा आतंकवाद केवल हथियारों के बाजार की हकीकत है। यह कहना है देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में दो दशक से अधिक सामाजिक कार्य कर चुके अजित कुमार का जो पिछले कुछ महीनों से कश्‍मीर पर काम कर रहे हैं। दि राइजिंग न्‍यूज ने जब उनसे कश्‍मीर मुद्दे पर बात की तो उन्‍होंने बिना किसी झिझक के बेबाकी से पूरी हकीकत रखने की कोशिश की।

 

कश्‍मीर समस्‍या की मूल वजह?

समस्‍या कश्‍मीर नहीं है। समस्‍या बाजार है। दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद वैश्विक स्‍तर पर बनाए गए सभी संगठन (आइएमएफ, विश्‍वबैंक, अंकटाड, जी सेवेन, जी-20) इसके पीछे हैं। इन संगठनों पर चुने देशों का कब्‍जा है। इनकी आड़ में पूरे विश्‍व में बाजार बनाकर शक्तिशाली देश अपनी अर्थव्‍यवस्‍था का इंजन तेज करते हैं। पूरा विश्‍व हथियार, तेल, फार्मा, ब्‍यूटीप्रोडक्‍ट और खाद्य सामानों के बाजार के रूप में ढाला जाता है। आग लगाई जाती है फिर हर पक्ष को अपना सामान बेचकर पैसा बनाया जाता है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर पिछले 46 सालों से अफगानिस्‍तान खत्‍म क्‍यों नहीं हो गया।



आखिर क्‍या कारण है जो वहां के लोग आजादी के नारे लगाते हुए सेना और पुलिस के जवानों पर पत्‍थरबाजी करते हैं ?

हकीकत तो ये है कि आजादी के नारे लगाने वाले को ही यह नहीं पता होता है कि वे किससे आजादी मांगते हैं। उनसे जब यह पूछा जाता है किस देश में रहते हो तो उनका जवाब भारत होता है। घाटी में कुछ चंद लोग हैं जो ऐसे लोगों को उकसाते हैं। गरीबी और अशिक्षा की वजह से घाटी के लोग आसानी से उनके बहकावे में आ जाते हैं और इसमें कूद पड़ते हैं।


 

इससे उनका क्‍या फायदा होता रहा है ?

आप देख रहे होंगे कि पिछले तीन महीनों से घाटी बंद है। दुकानें बंद हैं और पूरी वहां की इकोनॉमी ठप है। रोज खाने और कमाने वाला घाटी आखिर कैसे जी रहा है? यहां पर आकर उन लोगों की भूमिका बनती है जो ऐसे लोगों की अर्थव्‍यवस्‍था को चला रहे हैं। घाटी में चंद मुस्‍लिम नेता हैं जो बंद के दौरान मामूली धनदेकर दोगुना कमाते हैं। घाटी के लोगों की सारी उधार चुकाने में चली जाती है। वहां आतंकवाद के पोषक लोग धनी और धनी बनते चले जा रहे हैं। उनके बच्‍चे पत्‍थर फेंकने वालों में शामिल नहीं हैं बल्कि वे देश के बाहर पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं।


 

कई बार आरोप लगते हैं कि घाटी के मुस्लिम लोग ही भारत सरकार के और सिस्‍टम के विरोध में हैं?

हिंदू-मुसलमान की बात करना तो एकदम गलत है। वे सभी भारतीय हैं। हिंदू- मुसलमान में बांटने वाले तो राजनीतिक लोग हैं। राजनीति की वजह से वे हिंदू या मुसलमान हुए हैं। रही बात सरकार और सिस्‍टम के विरोध की तो यह विरोध तो कई अन्‍य जगहों पर भी होता है। हिंदू मुस्लिम के नाम पर नेहरू और जिन्‍ना ने देश को दो हिस्‍सों में बांट दिया। जबकि नेहरू कहते थे कि वे एक्सिडेंटल हिंदू हो गए और जिन्‍ना उन चीजों को भी खाते थे, मुसलमान जिसका नाम लेने से भी कतराते हैं। इससे साबित होता है कि उन लोगों ने हिंदू या मुसलमान के लिए नहीं बल्कि खुद के प्रधानमंत्री बनने के लिए यह किया। लेकिन इसी राजनीति ने हिंदू-मुसलमान के बीच गहरी खाई बना दी है।


 

घाटी के लोग क्‍या चाहते हैं ?

घाटी के लोग विकास चाहते हैं। गुड गवर्नेंस चाहते हैं। किसी भी राज्‍य का गुड गवर्नेंस वहां की जनता के लिए रोटीकपड़ामकानपढ़ाईदवाई, सड़कबिजलीपानीसुरक्षा और न्‍याय व्‍यवस्‍था पर आधारित होता है। घाटी के लोगो को यही चाहिए। लेकिन वहां के राजनीतिक दलों ने यह होने नहीं दिया। वे केवल अपनी राजनीति चमकाते रहे। वहीं जबकि घाटी के लोगों ने लोकतंत्र पर पूरा विश्‍वास जताया। घाटी में सभी विधानसभा और लोकसभा सीटों पर चुनाव होते हैं। जनप्रतिनिधि वहां से चुनकर आते हैं। जम्‍मू कश्‍मीर की जनता का लोकतंत्र पर विश्‍वास नहीं होता तो चुनाव संभव न हो पाते। वहां की जनता इससे बड़ा सुबूत और क्‍या दे सकती है ?


 

कश्‍मीर की समस्‍या के लिए आप किसे जिम्‍मेदार ठहराना चाहेंगे ?

इसके लिए देश के जिम्‍मेदार राजनीतिज्ञों को। इसके अलावा दुनिया के महाशक्ति देशों को। बड़े देश यह कतई नहीं चाहते कि कश्‍मीर की समस्‍या का हल निकले। वे इसे हथियारों की खरीद फरोख्‍त का बाजार बनाए रखना चाहते हैं। भारत और पाकिस्‍तान आज युद्ध जैसे माहौल में खड़े हो गए हैं। यह बात अलग है कि वे युद्ध नहीं करने जा रहे। फिर भी वे हथियार खरीदते जा रहे हैं। पाकिस्‍तान की तो आर्थिक हालत एकदम खराब है फिर भी वह हथियार खरीदने पर बड़ी रकम खर्च कर रहा है। वह यही रकम शिक्षास्‍वास्‍थ्‍य व अन्‍य क्षेत्रों पर खर्च कर सकते हैं लेकिन नहीं कर पा रहे हैं।


 

यह माहौल कैसे बदलेगा और वहां शांति कब होगी?

फिलहाल, एक दिन में नहीं होगा। कुछ कदम सरकार चल रही है। कुछ कदम घाटी के परेशान लोगों ने चलना आरंभ कर दिया है। चंद पैसे पर पत्‍थर फेंकने वालों को छोड़कर घाटी के बाकी लोग अलग दुलिना बसा रहे हैं। बहुत जल्‍द घाटी के बाहर फेंके गए कश्‍मीरी पंडितों की वापसी सुनिश्चित करनी होगी। इससे घाटी में माहौल बदलने लगेगा। सरकार इस दिशा में ही आगे बढ़ रही है। ज्‍यादा से ज्‍यादा 2018 तक कश्‍मीर बदला दिखने लगेगा। ऐसी उम्‍मीद की जा रही है।


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