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राजनीतिक दलों के लिए आरके चौधरी के दरवाजे खुले

     
  
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  • मैं किसी भी दल में शामिल नहीं होने वाला हूं: आरके चौधरी
  • राजनीतिक पार्टी के गठन की बाकायदा घोषणा बहुत जल्‍द


दि राइजिंग न्‍यूज ब्‍यूरो

अजय दयाल

पासी समाज के बड़े नेता माने जाने वाले आरके चौधरी इन दिनों बहुजन समाज पार्टी से अलग होकर एक नया राजनीतिक तानाबाना बुन रहे हैं। बीती एक जुलाई को बसपा से दोबारा अलग हुए संस्थापक सदस्यों में से एक चौधरी इससे पहले भी 11 साल आठ महीने के लिए पार्टी से अलग रह चुके हैं। हालांकि चौधरी 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी कैंडिडेट कौशल किशोर से हार गए थे, लेकिन दलित समाज को जागरूक करने का उनका अभियान कभी कमजोर नहीं पड़ा। बीएसपी और सपा की पहली साझा सरकार में वह मंत्री थे। पार्टी में मायावती के बढ़ते प्रभाव के कारण ही उन्होंने साल 2001 में बीएसपी का दामन छोड़ा था। बीएसपी से अलग होकर आर के चौधरी ने राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी बनाई थी। दि राइजिंग न्‍यूज के साथ एक विशेष बातचीत में आरके चौधरी ने अपनी राजनीतिक रणनीति के साथ-साथ दलित समाज ही नहीं कांशीराम और मायावती को लेकर भी बेबाक और खरी-खरी प्रतिक्रिया दी।


अपनी राजनीतिक रणनीति का कुछ खुलासा कीजिए?

सामाजिक मंच बीएस-फोर से तो मैं संघर्ष कर ही रहा हूं, रही बात राजनीतिक मंच की तो मैं एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने की सरकारी औपचारिकताएं पूरी कर रहा हूं। निकट भविष्‍य में मैं अपनी राजनीतिक पार्टी के गठन की बाकायदा घोषणा करूंगा।


आपकी राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान पार्टी का क्‍या हुआ?

उस पार्टी को मैंने बहुजन समाज पार्टी के साथ विलय कर दिया था। ऐसे में मुझे अपनी पार्टी होने के बावजूद बसपा के सिंबल पर चुनाव लड़ना पड़ेगा जो कि कतई उचित न होगा। नई पार्टी का गठन इसी व्‍यवहारिक पेंच के कारण करना पड़ रहा है। नई पार्टी का नाम पुरानी पार्टी से ही कुछ मिलता-जुलता रहेगा।


स्‍वामी प्रसाद मौर्य की तरह क्‍या आप भी किसी पार्टी का दामन थामने जा रहे हैं?

एक बात मैं साफ तौर पर कहा रहा हूं, मैं किसी पार्टी में नहीं जाने वाला हूं, हां इतना जरुर चाहता हूं कि, किसी बड़े दल से मेरी पार्टी का गठबंधन हो जाए, इसके लिए मेरी बातचीत चल रही है। जैसा कि कहा जाता है, मैं भी कहना चाहता हूं... राजनीतिक दलों के लिए आरके चौधरी के दरवाजे खुले हुए हैं।


स्‍वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा में दिल्‍ली से इंट्री की है, स्‍वागत लखनऊ में कराया है, आप भी ऐसा करेंगे

जैसा मैंने पहले कहा कि, मेरा किसी दल में शामिल होने का इरादा नहीं है। मौर्य को मेरी शुभकामनाएं। वे भाजपा में फले-फूले आगे बढ़े। मेरा केवल दूसरे दलों के साथ सीट गठबंधन करने का इरादा है। मेरा अपना वजूद है। उसी के सहारे यूपी में अपने दम पर पार्टी को खड़ा करने का इरादा है।


इस संदर्भ में किन-किन दलों से आपकी बात हुई है?

आपको याद होगा 26 जुलाई को बीएस-फोर के बैनर तले हमने रैली की थी। जिसमें बिहार के सीएम नीतीश कुमार भी शामिल हुए थे। उस रैली तक हमने सभी दलों से किसी भी राजनीतिक बातचीत के लिए मना कर रखा था। रैली के बाद मैं दिल्‍ली गया और सभी दलों के बड़े नेताओं से मुलाकात की।


सुना है अपने साथ आने वाले दलित बसपा नेताओं की एक लिस्‍ट भी तैयार की है आपने?

हां, यह सच है...बसपा के तमाम नेता मेरे संपर्क में है। मैंने एक लिस्‍ट दिल्‍ली जाकर राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं के साथ राजनीतिक बातचीत में साझा की है।


मायावती की राजनीतिक सोच पर क्‍या कहना चाहेंगे?

न जाने बहनजी को पैसा लेकर टिकट बेचने की सलाह कौन दे रहा है। मिश्रा जी दे रहे हैं या कोई और? कार्यकर्ता इस बात को लेकर काफी व्‍यथित हैं। एमपी, एमएलए ही नहीं जिला पंचायत सदस्‍यों तक के चुनाव में टिकट के लिए बसपा में पैसा लिया जा रहा है...यह कौन सी राजनीति है?


 ...तो आपकी नजर में बसपा का भविष्‍य?

बहनजी का रवैया अगर यही रहा तो अभी नेतागण उनको छोड़कर जा रहे हैं, आगे चलकर कार्यकर्ता छोड़ेंगे और बाद में बसपा के खिलाफ सामाजिक आंदोलन शुरू हो जाएगा।


ऐसे हालात में कांशीराम जी को आप कैसे याद करते हैं?

कांग्रेस में एक दलित धड़े को तोड़कर मान्‍यवर कांशीराम जी ने बसपा का गठन किया था। दलित उत्‍थान कांशीराम जी का एकमात्र लक्ष्‍य था। कांशीराम के तैयार किये गए सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन आज अंधकार में है और मायावती की कार्यप्रणाली के चलते अब इसका आगे बढ़ पाना संभव नहीं है।


बसपा के लिए कांशीराम जी की भूमिका पर क्‍या कहना चाहेंगे?

मान्‍यवर कांशीराम जी ही थे, जिन्‍होंने देशभर में 4200 किलोमीटर की साइकिल यात्रा करके अपना खून-पसीना बहाया और 10-20 एवं 50-100 रुपये के कूपन के जरिए धन एकत्र करके बहुजन समाज पार्टी का इतना बड़ा मिशन खड़ा किया। मान्‍यवर चुनाव लड़ने के लिए जमीनी कार्यकर्ताओं को ही तरजीह देते थे। उन्‍होंने 1993 में सपा-बसपा गठबंधन से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को ही उतारा था और पहली बार बसपा के 12 विधायकों से बढ़कर 67 विधायक बने थे।


कांग्रेस में तो इधर काफी गर्माहट दिखाई दे रही है, क्‍या कहना चाहेंगे?

शीला दीक्षित के यह बयान जारी कर देने से कि, हम किसी दल से गठबंधन नहीं करेंगे अपने बूते चुनाव लड़ेंगे, से कुछ नहीं होने वाला। मुझे नहीं लगता कांग्रेस में कोई तेजी आई है। कांग्रेस शीला दीक्षित के नाम पर समाज के जिस वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करना चाहती है वह किसी भी पार्टी का आधार नहीं होते।


अपनी बात को कुछ स्‍पष्‍ट कीजिए?

मेरे कहने का आशय है देश का दलित समाज आज एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की राह पर है ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल दलितों को अपना आधार बनाए बगैर लोकतंत्र की परिकल्‍पना पर अधूरा ही रहेगा और है।




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