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फकत दलित सियासत और बैकफुट पर सरकार

| Last Updated : 2018-04-03 09:48:56

 

  • नियंत्रण के बजाए जान बचाती दिखी मुस्तैद पुलिस

  • हवा में दिखाई दिए कानून व्यवस्था पर नजर रखने के दावे


Updates over Protest on SC and ST Act Changes Done by Supreme Court of India


दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित आंदोलन की सुगबुगाहट की अनदेखी का खामियाजा प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में लोगों ने भोगा। अर्से से पनप रहा असंतोष कुछ इस कदर फूटा कि प्रदेश में ताबड़तोड़ एनकाउंटर कर अपराधियों को नाकों चने चबवाने का दलील देने वाली मुस्तैद पुलिस अपनी जान बचाने के लिए भागती दिखाई दीं। शासन–प्रशासन सारी मशीनरी फेल नजर आईं। खास बात यह रही कि इस पूरे आंदोलन में कोई एक संगठन नहीं था न ही कोई सियासी दल खुलकर सामने था लेकिन आंदोलन ऐसा था कि आगरा, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, आजमगढ़, हापुड़ और मेरठ में हालात काबू के बाहर हो गए। आंदोलन की आड़ में जमकर बलवा हुआ, हिंसा हुई और फायरिंग हुई मगर सरकार केवल तमाशबीन बनी ही दिखाई दीं। दिन भर लोकतंत्र में उपद्रव – हिंसा और बलवे से खुद अलग रखने वाले तमाम विपक्षी दल इसे लोगों का आक्रोश करार देते दिखाई दिए।

 

दरअसल दलित आंदोलन की आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इसका विरोध शुरू हो गया था। हालांकि केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की घोषणा की थी लेकिन सोशल मीडिया पर इस पूरे मामले को आरक्षण के खिलाफ बताकर प्रचारित किया  जा रहा था। इसके खिलाफ सोमवार को भारत बंद का आह्वान भी किया गया था। खास बात यह रही कि इस पूरे आंदोलन में कोई सियासी दल सामने नहीं था लेकिन विपक्षी दल इस मुद्दे से अलग नहीं थे। लिहाजा अंदर अंदर ही तैयारी चल रही थी जबकि सरकार इसे लेकर ज्यादा गंभीर नहीं थीं। इसी अदूरदर्शिता का खामियाजा सोमवार को देश में कई राज्यों देखने को मिला।

पश्चिम उत्तर प्रदेश में हालात रहें बेकाबू

मेरठ में कचहरी परिसर में हमला और फायरिंग। आगरा में स्कूल बस पर आगजनी व थाने पर हमला। हापुड़ में पुलिस चौकी पर हमला तो फिरोजाबाद में थानेदारा की पिटाई। आगरा, मुजफ्फरनगर, आजमगढ़, मेरठ, हापुड़, मुरादाबाद सहित कई शहरों में करीब दो दर्जन रोडवेज बसें फूंक दी गईं। यात्रियों को जान के लाले पड़ गए लेकिन मुस्तैद पुलिस कहीं दिखाई नहीं दीं। इतना जरूर गनीमत रहीं कि राजधानी में किसी तरह की अप्रिय घटना नहीं देखने को मिली। खास बात यह है कि प्रदेश में दलित आंदोलन के नाम पर दिन भर उपद्रव होता रहा। हिंसा –आगजनी हुई लेकिन सरकार तमाशबीन ही बनी रही। स्थिति बिगड़ने के बाद पुलिस प्रशासन जरूर हरकत में दिखा लेकिन उस वक्त हालात नियंत्रण के बाहर हो चुके थे। खास बात यह दलित और पिछ़ड़े वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों की अगुवाई में शुरू हुई इस आंदोलन से पहले भले सारे सियासी दल दूर दिखे लेकिन शाम होते होते इसे दलित वर्ग आक्रोश करार देने में कोई पीछे नहीं रहा।

 

करा दिया ताकत अहसास

सोमवार सुबह से चल रहे आंदोलन के बाद शाम को बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसे दलित वर्ग के प्रति भारतीय जनता पार्टी की दुर्भावना का प्रतीक करार दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा दलितों की विरोधी रही है और इस कारण से उनके अधिकारों में कटौती की साजिश कर रही है। मगर इसे पिछड़े व दलित स्वीकार करने वाले नहीं है। इसके खिलाफ आंदोलन आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा भले ही सरकार में उनका प्रतिनिधित्व नहीं है लेकिन ऐसी किसी साजिश का नेस्तनाबूद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

वहीं, समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी इसे भाजपा की कुनीतियों का परिणाम बताया। समाजवादी पार्टी नेताओं ने इसके लिए सीधे तौर पर सरकार की असफलता और विघटनकारी नीतियों को ही वजह करार दिया। सपा नेता सुनील साजन ने प्रदेश के कबीना मंत्री द्वारा पिछले डा. बीआर आंबेडकर के शुद्धीकरण को लेकर दिए बयान पर ही जमकर हमला किया। जबकि कांग्रेस पर्दे के पीछे से ही आंदोलन को अपनी सहमति दे चुकी थी और राष्ट्रीय राहुल गांधी ने आरक्षण के खिलाफ आंदोलन को समर्थन दिया था।

 

परवान चढ़ी घर की चिंगारी

बहराइच से भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले द्वारा की गई आरक्षण बचाओ रैली और उसके पहले सुप्रीम कोर्ट फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार के साथ गठबंधन में शामिल लोजपा नेता रामविलास पासवान दलित वर्ग व उनके अधिकार के प्रति सरकार की मुखालफत कर चुके हैं। इसके पहले गुजरात चुनाव में भी दलित वर्ग की नाराजगी देखने को मिली थी। उत्तर प्रदेश में इसी विरोध का नतीजा गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव के रूप में भी देखने को मिला था। बावजूद इसके विपक्षियों को हाशिए पर आंकने तथा दलित वर्ग के वोटों में सेंधमारी में लगी भाजपा के लिए अब यह आंदोलन बड़ा सवाल खड़ा करती दिख रही है। आंदोलन भले ही एक दिन का था लेकिन राजनैतिक विष्लेशकों के मुताबिक कम से कम आने वाले लोकसभा आम चुनाव में विपक्ष को एकजुट होने के लिए यह एक बड़ा आधार साबित होगा।

 



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