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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

नए वादों का जो डाला है वह जाल अच्छा, रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है . . ।

 

गालिब की यह गजल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट पर एकदम सटीक बैठती है। अर्थशास्त्री भी बजट में ज्यादा कुछ न होने का दावा करते हैं। व्यापारी नाखुश हैं जबकि मध्यम वर्ग खुद ठगा महसूस कर रहा है। इतना होने के बाद सरकार बजट को बेहद संतुलित करार दे रही है। यह अलग बात है कि बजट में बच्चों के खिलौने से लेकर पापा की शेविंग क्रीम तक महंगी करने की तैयारी हो गई है लेकिन सरकार बजट को सभी के लिए बहुत बेहतर करार दे रही है। यह अलग बात है कि स्वास्थ्य सेवाओं को सरकार ने फोकस किया लेकिन वहां पर भी सेस एक फीसद बढ़ा दिया। यानी तीन फीसद से बढ़कर अब चार फीसद सेस लगेगा।

बजट की खासियत की बात करें तो बजट में इस बार स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र  को ज्यादा फोकस किया गया है लेकिन रोजगार के मुद्दे पर बजट में कुछ खास नहीं है। हालांकि सरकार ने 70 लाख लोगों को रोजगार देने की बात कही है लेकिन ये रोजगार कैसे उत्पन्न होंगे, फिलहाल स्पष्ट नहीं  है। यही नहीं सरकार बनने से पहले चार करोड़ लोगों को हर साल रोजगार देने की घोषणा सरकार के अंतिम वर्ष में भी दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। कृषि सेक्टर में किसानों को फसल बीमा और न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा तो हुई लेकिन इसका लाभ किसानों तक कम ही पहुंचा। ऐसे में वर्तमान बजट को लेकर लोगों में खासा उत्साह था लेकिन घोषणा के बाद लोगों के हाथ निराशा ही लगीं। आयकर की स्लैब में बदलाव न होने के कारण लोग भी मायूस दिखे। अर्थशास्त्री भी कहते हैं कि सरकार ने पचास करोड़ लोगों के स्वास्थ्य बीमे की बात कही है। शिक्षा के स्तर को बढ़ाने की बात कही है लेकिन यह कब लोगों तक पहुंचेगा, यह देखने वाली बात है।

महंगाई के मोर्चे पर आम आदमी की बलि

वर्तमान बजट में सबसे ज्यादा झटका आम आदमी को लगा है। दरअसल बजट में सब्जी से लेकर स्कूटर –कार तक सब महंगा हो गया है। सरकार नर्सरी से लेकर इंटर तक शिक्षा को लेकर गंभीरता दिखा रही है लेकिन आम अभिभावक स्कूलों की मनमर्जी का शिकार है। हर साल फीस बढ़ रही है। यहां तक कि आवेदन फार्म तक की कीमत पिछले तीन सालों में तीन गुना से ज्यादा हो चुकी है और सरकार की भूमिका केवल तमाशबीन की तरह की दिखी है। ऐसे में महंगाई का कहर लगातार जारी रहने की संभावना दिख रही है और इसका सीधा असर मध्यम वर्ग पर ही पड़ना लाजिमी दिख रहा है। बजट में पेट्रोलियम पदार्था डीजल –पेट्रोल पर भी एक्साइज ड्यूटी नहीं कम की गई। इससे माल ढुलाई से भी किसी तरह की राहत मिलने के आसार नहीं है।  

 

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