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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।  

 

मुख्यमंत्री योगी स्वच्छ ईमानदार सरकार और नियमानुसार सबका विकास करने के दावे करते नहीं थक रहे लेकिन उनकी सरकार में नौकरशाह मनमाने ढंग से सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। पूर्ववर्ती सरकार पर तबादला उद्योग चलाने और चेहेतों को कुर्सी बांटने का आरोप लगाने वाली प्रदेश सरकार अब खुद इन आरोपों से घिरी नजर आती है। तबादलों को लेकर सरकार की नीति तो कम दिखाई दे रही है, अलबत्ता नीयत पर सवाल जरूर खड़े हो रहे हैं। परिवहन विभाग का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

 

अब जरा गौर करें। परिवहन आयुक्त दफ्तर में रविवार देर रात कई अधिकारी विभाग के बाबुओं के स्थानांतरण के लिए मशक्कत करते रहें। उसके बाद सोमवार को जो सूची जारी हुई, उसमें पंद्रह लोगों के नाम शुमार थे। लखनऊ आरटीओ दफ्तर से दस बाबुओं का तबादला कर दिया गया। इनमें छह कर्मचारी ऐसे हैं जो करीब 11 महीने पहले ही लखनऊ  स्थानांतरित हुए थे। किस नीति के तहत इनका तबादला हुआ, इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है। खास बात यह है कि लखनऊ में तैनाती पांच लोगों को दी गई जिनमें आगरा, आजगढ़ व बाराबंकी से एक एक तथा फैजाबाद से दो लोगों को लखनऊ स्थानांतरित किया गया है। यानी दस कर्मियो के स्थान पर पांच कर्मचारी।

वैसे यह कोई पहला मौका नहीं था। इसके पहले विभाग ने आरटीओ व सहायक संभागीय परिवहन अधिकारियों (एआरटीओ) की सूची भी जारी की थी। खास बात यह है कि इस सूची के जारी होने से पहले भी आधी रात तक मशक्कत हुई थी। लंबी बैठक के बाद तय हुई सूची में कई नाम ऐसे थे, जिन्हें उसी जिले में प्रवर्तन से हटाकर प्रशासन या फिर प्रशासन से हटा कर प्रवर्तन पद पर तैनाती दे दी गई। यानी जगह –बदली न कुर्सी और स्थानांतरण भी हो गया। ऐसा किन परिस्थितयों में हुआ, इसका भी कोई जवाब नहीं है और हफ्ते भर बाद सवाल अनुत्तरित ही है। उधर स्थानांतरण सूची जारी होने के बाद इस संबंध में बात करने के लिए परिवहन पी गुरुप्रसाद से कई बार बात करने का प्रयास किया गया लेकिन उनका जवाब नहीं मिला। जबकि मुख्यालय के अन्य अधिकारी इसे सरकार की मंशा के अनुरूप हुई कार्रवाई करार देते रहें।

 

भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस का उदाहरण

परिवहन विभाग में जारी कर्मचारियों की सूची भ्रष्टाचार के प्रति सरकार के जीरो टालरेंस का प्रत्यक्ष उदाहरण बन गई है। दरअसल विभाग ट्रांसफर को लेकर चर्चाएं काफी समय से चल रहीं थीं। उसके बाद सूची जारी होने के बाद वह एकदम पुख्ता हो गई। दरअसल दोनों तबादला सूची में कई नाम ऐसे हैं, जो किसी तरह से स्थानांतरण के दायरे में नहीं आते और अधिकारी भी इसे सरकार की मर्जी बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं।

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