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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ। 

 

कहा जाता है, ऑल फेयर ही लव एंड वार। उसी तर्ज पर भारतीय जनता पार्टी भी कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनावों में हर पैंतरा अपना रही है। इसी क्रम में कैराना व नूरपुर में उपचुनाव में टिकट स्व. पूर्व विधायकों के परिवारी जनों को दिए गए हैं। इससे पार्टी को दो तरह के फायदे नजर आ रहे है, पहला एक तो जाट व सवर्ण वोट साध लिए जाएंगे और दूसरा सहानभूति भी परिवारी जनों को मिलेगी। कैराना से भाजपा की प्रत्याशी के सांसद रहे स्व. हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह होंगी। इसी तरह से नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में विधायक रहे स्व. लोकेंद्र सिंह की पत्नी का टिकट पक्का माना जा रहा है।

दरअसल इसकी कई वजह भी है। इन प्रत्याशियों के साथ सहानभूति लहर तो होगी ही और पार्टी अपने जाट व सवर्ण वोटों को बिखरने से रोक सकेगी। यानी इन दोनों प्रत्याशियों के जरिए पार्टी अपनी जातीय समीकरण को भी साधने में सफल रहेगी। दरअसल, कैराना में तब्बसुम हसन को रालोद, समाजवादी पार्टी व बसपा का समर्थन मिल रहा है। माना जा रहा है कि कांग्रेस भी यहां संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी का ही समर्थन करेगी और ऐसे में भाजपा की राह मुश्किल हो गई है। जबकि भाजपा को पटखनी देने के लिए विपक्ष कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। तभी तब्बुसम हसन को रालोद की सदस्यता दिलाकर उन्हें रालोद प्रत्याशी बनाया गया। इसी तरह से नूरपुर से समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी भी मैदान में है और उसे पूरे विपक्ष का समर्थन मिलना तय माना जा रहा है।

 

इस गणित में भाजपा की सीटें काफी मुश्किल दिख रही है। कारण है कि वोट प्रतिशत के हिसाब से भी अगर विपक्ष के एक हो जाता है तो उसका वोट प्रतिशत इतना हो जाता है कि वह सहजता से सत्तारुढ़ पार्टी को शिकस्त दे सकें। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी भी बहुत मंथन कर रही थी और अब प्रत्याशी घोषित किए गए हैं। दरअसल पिछले दिनों हुए फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव में मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री द्वारा छोड़ी सीटें गंवाने के बाद पार्टी इन दोनों सीटों पर कब्जा बनाए रखना चाहती है। दरअसल इन सीटों के हार जीत का सीधा असर 2019 की लोकसभा आम चुनाव में दिखना तय माना जा रहा है। इसके साथ ही इन सीटों पर अगर विपक्ष एक हो जाता है तो भाजपा के खिलाफ संपूर्ण एकजुट विपक्ष बनने की राह में काफी हद तक साफ हो जाएगी। हालांकि कांग्रेस ने फिलहाल यहां पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

दांव पर योगी की प्रतिष्ठा

लोकसभा उपचुनाव में अपनी परंपरागत सीट गोरखपुर तथा उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर को गंवान के बाद इन दोनों उपचुनाव को सीधे मुख्यमंत्री योगी की प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखा जा रहा है। दरअसल प्रदेश के बाद लोकप्रिय हिंदूवादी भाजपा नेता के तौर योगी का कद बढ़ा है लेकिन अपने ही घर में हार के कारण उनकी किरकिरी भी हुई। ऐसे में प्रदेश सरकार दोनों उपचुनावों में किसी तरह के मुगालते में नहीं रहना चाहती है। माना जा रहा है कि कर्नाटक चुनाव के बाद प्रदेश सरकार की सक्रियता पश्चिम उत्तर प्रदेश में बढ़ेगी। जबकि फिलहाल विपक्ष गन्ना किसानों की समस्याओं से लेकर पलायन के मामले में प्रदेश सरकार को घेर रहा है।

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