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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।  

 

मतदान केंद्र पर लंबी कतार लेकिन पहले दो घंटों में बामुश्किल दस प्रतिशत मतदान। वजह ईवीएम मशीन की गड़बड़ी। गड़बड़ी भी इक्का दुक्का मतदान केंद्रों पर न होकर दर्जनों केंद्रों पर। लिहाजा ईवीएम पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी बहाने कैराना और नूरपुर चुनावी नतीजों के पहले मतदान के दौरान ही आरोप –प्रत्यारोप के दौर शुरु हो गए। सरकार से लेकर प्रशासन तक पर ईवीएम में जान बूझ कर गड़बड़ी करने के आरोप लगने लगे। विपक्ष ने इसे सीधे तौर पर सरकार की साजिश करार दिया और दलित –मुस्लिम बहुल इलाकों में ही ईवीएम खराब होने का दावा किया।

दरअसल नूरपुर विधानसभा और कैराना लोकसभा संसदीय सीट के लिए हो रहा उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी और विपक्ष के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है। यहां भाजपा शिकस्त देने के लिए विपक्ष एकजुट है। मगर मतदान के पहले ही घंटे में ईवीएम खराब होने पर सत्तारुढ़ प्रदेश सरकार और प्रशासन विपक्ष के निशाने पर आ गया। दरअसल नूरपुर में अस्सी से अधिक तथा कैराना में भी करीब तीन दर्जन ईवीएम खराब होने के कारण मतदान प्रभावित हुआ। इतनी बड़ी संख्या में ईवीएम खराब होने से इसमें प्रशासनिक लापरवाही तो उजागर हुई ही, साजिश से इंकार नहीं किया गया।

समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने इसे सरकार के इशारे पर प्रशासन की साजिश करार दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि ईवीएम उन इलाकों में ही क्यों खराब हुई, जहां दलित व मुस्लिम वोट अधिक थे। सपा ने इसके खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत करने का भी दम भरा है।

 

पहले भी उठते रहे हैं ईवीएम पर सवाल

दरअसल मतदान में ईवीएम के इस्तेमाल को लेकर बहुजन समाजपार्टी से लेकर कांग्रेस तक पहले भी सवाल उठाते रहे हैं। इसके लिए चुनाव आयोग को भी पत्र दिए गए। हालांकि इन आरोपों को हार के बाद की प्रतिक्रिया के रूप में देखते हुए उसे दरकिनार किया जाता रहा है लेकिन अब मतदान के दौरान ही ब़ड़ी संख्या में ईवीएम खराब होने के बाद इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं। सपा-रालोद के संयुक्त प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने कहा कि रमजान का महीना और अधिक गर्मी होने होने के कारण बड़ी संख्या में सुबह ही मतदान केंद्रों पर भीड़ लगने लग गई थी और ऐसे में ईवीएम खराब होने के कारण मतदाताओं को वापस होना पड़ा। बिना मतदान के मतदाताओं के लौटने के बाद उनके दोबारा मतदान केंद्र तक आने में संख्या कम हो जाएगी और इसका फायदा सीधे तौर पर सत्तारुढ़ पार्टी को मिलेगा।

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