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दि राइजिंग न्‍यूज

आउटपुट डेस्‍क।

 

छह दिसंबर बुधवार यानी अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचा गिराए जाने की 25वीं बरसी । इससे ठीक एक दिन पहले यानी मंगलवार पांच दिसंबर को देश की सर्वोच्च मामले की सुनवाई में शुरु हुई। सुनवाई पहले ही दिन अगली सुनवाई के लिए आठ फरवरी 2018 की तारीख तय कर दी गई। मगर कम ही लोग जानते हैं कि इस 65 साल पुराने इस मामले में कई ऐसे पहलू ऐसे हैं जो आजतक अनछुए हैं। ऐसे ही कुछ राज से आज हम आपको रूबरू कराते हैं।   

   

हकीकत-ए-तारीख

छह दिसंबर 1992 भारतीय इतिहास के एक काले दिन के रूप में याद किया जाता है। 25 साल पहले इसी तारीख को 464 बरस पुरानी बाबरी मस्जिद (जिसे बाद में विवादित ढांचा माना गया) को कारसेवकों ने ध्वस्त कर दिया था। यह तमाम वाकयाउस वक्त हुआ जब विश्व हिन्दू परिषद और बीजेपी आह्वान पर कारसेवा के लिए भीड़ एकत्र हुई थी। मगर एक पहलू ये भी है कि ऐसा क्या हुआ था, जिसने 1949 से ठंडे बस्ते में जा चुके इस “मुद्दे” को राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रबिंदु बना दिया था।

 

क्या आप जानते हैं कि 1949 में भी जब रातों-रात यहां मूर्ति स्थापित हुई तो ये राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना। हम में से अधिकतर भारतीय आज के समय में ये मानते हैं कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा तब सामने आया जब अस्सी के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राम जन्मभूमि के गर्भगृह पर पूजन कराया। उसके बाद एक फरवरी 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर अदालती आदेश के साथ पूजा अर्चना के लिए गर्भगृह को खुलवाया था। राजनीति के जानकारों के मुताबिक राम जन्म भूमि का प्रकरण दरअसल राजनैतिक महात्वाकांक्षा और देश में हिंदू वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस द्वारा उठाया गया कदम था। मगर उसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरागांधी की हत्या हो गई। उसके बाद उनके पुत्र एवं प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस मुद्दे को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया लेकिन वह भी सफल नहीं हो सकें।

 

 

कहानी का एक पहलू यह भी है कि अयोध्या से 2000 किलोमीटर दूर तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम गांव से। इस गांव के सैकड़ों “अछूत” माने जाने वाले हिंदुओं ने साल 1981 में इस्लाम धर्म अपना लिया था। इसने देश की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया और उस समय देश के कई बड़े नेता वहां दलितों को समझाने के लिए भी गए थे। अटल बिहारी वाजपेयी उनमें से एक थे।

 

जांच समिति बनी पर उसने पाया की ये लालच द्वारा धर्मान्तरण का मामला नहीं है, परन्तु इसने हिन्दू धार्मिक गुरु और नेताओं को सतर्क कर दिया। इस प्रकरण के बाद दो बातों पर जोर दिया गया। एक तो ये कि हिन्दू धर्म से छुआछूत को खत्म करना होगा और दूसरा मुसलमानों की ओर दलितों को जाने से रोकना होगा।

 

इसी कड़ी में विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) ने 1984 के अगस्त में दिल्ली में एक धर्म संसद का आयोजन किया, जिसमें देशभर से साधू-संत आदि ने भाग लिया। उसके बाद से ये संसद हर वर्ष दो बार होने लगी और यही वीएचपी की आलाकमान है। यहां छह प्रस्ताव पारित हुए। जिसमें दलितों और आदिवासियों के उत्थान की बात कही गयी ताकि वे हिन्दू धर्म को छोड़ कर न जाएं और एक प्रस्ताव ये भी पारित हुआ कि “श्रीराम जन्मभूमी, काशी विश्वनाथ और कृष्ण जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण हो।”

 

यहां ये निर्णय भी लिया गया की 25 सितम्बर 1984 को सीतामढ़ी बिहार से रामजन्मभूमि मुक्ति यात्रा अयोध्या के लिए रवाना होगी। यहां भगवान राम को चुनने की वजह थी। मकसद था कि शबरी जैसी रामायण की कथाओं के जरिए दलितों को ये यकीन दिलाया जाए कि हिन्दू धर्म उनके प्रति उदार है।

 

 

पांच अक्टूबर को ये यात्रा अयोध्या पहुंची और वहां से सात अक्टूबर को लखनऊ के लिए रवाना हो गई। इस यात्रा के दौरान लाखों की संख्या में लोग जुटे। खुद वीएचपी के अनुमान से कहीं अधिक लोग छह अक्टूबर को अयोध्या में सरयू के तट पर मस्जिद का ताला खुलवाने का संकल्प लेने आए। टाइम्स ऑफ इण्डिया के अनुसार अयोध्या में 50,000 लोगों ने संकल्प लिया और लखनऊ में तीन लाख से अधिक लोग यात्रा का स्वागत करने पहुंचे थे। पहली बार अयोध्या राष्ट्रीय मीडिया के लिए खबर बन चुका था। एक फरवरी 1986 को मस्जिद का ताला खुला जिसको दूरदर्शन ने लाइव दिखाया। रातों-रात अयोध्या की बाबरी मस्जिद देश भर का मुद्दा बन चुकी थी। अब ये कुछ अखबारों से निकल कर घरों में टीवी तक आ गई थी।

 

नरसिम्हा राव रोक सकते थे विध्‍वंस

नरसिम्हा राव इस विध्वंस को होने से रोक सकते थे। छह दिसंबर 1992 को नरसिम्हा राव सुबह सात बजे सोकर उठे थे। दोपहर 12 बजे रेड्डी ने जब अपने घर का टेलीविजन खोला तो उन्होंने देखा की कई हजार कारसेवक बाबरी मस्जिद के गुंबदों पर चढ़े हुए हैं। कुछ ही देर बाद पहले गुंबद को नीचे गिरा दिया गया था।

 

 

रेड्डी को अचानक राव की चिंता हुई क्योंकि उनका हाल ही में दिल का ऑपरेशन हुआ था। रेड्डी दोबारा प्रधानमंत्री निवास पर गए। तब तक मस्जिद का एक ओर गुंबद भी गिरा दिया गया था। रेड्डी को देखकर राव गुस्से में आ गए और उनकी जांच की राव की ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ था। इसके बाद शाम छह बजे राव ने अपने निवास स्थान पर मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई। पूरी बैठक में राव ने एक शब्द तक नहीं बोला। इस बैठक में जाफ़र शरीफ़ ने कहा इस घटना की देश, सरकार और कांग्रेस पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इतना सुनते ही कांग्रेस के नेता माखनलाल फ़ोतेदार ने रोना शुरू कर दिया इसके बाद भी राव चुप ही बैठे रहे। 

 

मस्जिद के अलावा और भी बहुत कुछ टूटा था

  • 1991 में कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में वापस आ गई और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के चलते उत्तर प्रदेश में पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी।

  • कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर मस्जिद की सुरक्षा का वादा किया जिसके चलते अदालत ने विश्व हिंदू परिषद को सांकेतिक कार सेवा की अनुमति दी थी। लेकिन वीएचपी और बीजेपी नेताओं ने देश भर में घूम-घूम कर कारसेवकों को मस्जिद का नामोनिशान मिटाने की क़समें खिलाई थीं।

  • इनका हौसला बढ़ाने के लिए कल्याण सिंह ने घोषणा कर रखी थी कि पुलिस कारसेवकों पर गोली नही चलाएगी। इससे पहले 1990 में मुलायम सरकार ने कार सेवकों पर गोली चलवा कर मस्जिद को टूटने से बचा लिया था। कल्याण सिंह ने विवादित परिसर के बग़ल स्थित प्रस्तावित राम कथा पार्क की 42 एकड़ ज़मीन विश्व हिंदू परिषद को दे दी थी।

  • इसके अलावा पर्यटन विकास के नाम पर कई मंदिरों और धर्मशालाओं की ज़मीन अधिग्रहित कर समतलीकरण करवा दिया था और फ़ैज़ाबाद-अयोध्या राजमार्ग से सीधे विवादित स्थल के लिए चौड़ी सड़क बना थी।

  • देश भर से आए कारसेवकों को ठहराने के लिए विवादित परिसर से सटकर तंबू कनात लगाए गए। इन्हें लगाने के लिए फावड़े कुदाल रस्सियाँ वग़ैरह भी लाई गईं जो बाद में मस्जिद के गुंबदों पर चढ़ने और उन्हें तोड़ने में औज़ार के रूप में काम आए। कुल मिलाकर विवादित परिसर के आसपास कारसेवकों का ही क़ब्ज़ा था। इन लोगों ने चार-पाँच दिन पहले ही आसपास की कुछ मज़ारें क्षतिग्रस्त करके और मुस्लिम घरों में आग लगाकर अपना आक्रामक रुख़ प्रकट कर दिया था। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रेक्षक ज़िला जज तेज शंकर कह रहे थे कि सांकेतिक कारसेवा शांतिपूर्वक कराने के लिए सारी व्यवस्था दुरुस्त है।

 

होटल मालिक ने बताई आंखों देखी

जब बाबरी मस्जिद ढाहा गया था तबके अयोध्या शहर में मौजूद एक होटल के मालिक ने बताया उस समय की स्थिति के बारे में। होटल मालिक अनंत कुमार कपूर फैजाबाद जिले के होटल शान-ए-अवध के डायरेक्टरों में से एक हैं। अयोध्या इसी जिले में आता है। कपूर का होटल 1986 में बना था और अयोध्या नगर निगम के कार्यालय के ठीक पीछे है। वहां राम मंदिर आंदोलन को कवर करने के लिए अयोध्या में जमा हुए देश-विदेश के पत्रकार रूके थे और तब वे 46 साल के थे। होटल का पूरा कामकाज संभाला था। कपूर ने दिसंबर, 1992 के उन दिनों को याद करते हुए कहा, बाबरी मस्जिद ढहाने से एक दिन पहले यानी 5 दिसंबर, 1992 को आखिरी बार उसे देखा था। गौर हो कि छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में जमा हुए कार सेवकों ने 16वीं सदी में बनी बाबरी मस्जिद ढहा दी थी जिससे पूरे देश में हंगामा शुरू हो गया था। विध्वंस के बाद दंगे हुए और अयोध्या में कर्फ्यू लगाना पड़ा।

 

अयोध्या में 25 साल पहले बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान तनाव के बीच जब पत्रकारों का जमघट वहां जुटा तब कर्फ्यू प्रभावित शहर का एक होटल उनके रहने-सहने का ठिकाना बना था और होटल में भारत और विदेशों के 100 से ज्यादा पत्रकार रूके थे। पूरा होटल पत्रकारों से भरा हुआ था।

 

 

एंबेसडर कार मेरे लिए वरदान साबित हुई

होटल मालिक अनंत कुमार कपूर ने उनके लिए होटल में अतिरिक्त व्यवस्थाएं कीं और अपनी सफेद रंग की एंबेसेडर कार से खाने-पीने की एवं दूसरी जरूरी चीजें जुटाईं। हमें कमरों में अतिरिक्त चारपाइयां डालनी पड़ी थीं ताकि उनकी व्यवस्था हो सके, जिन्हें कोई कमरा नहीं मिला। उन्होंने बताया, जिला प्रशासन ने कर्फ्यू लगाने का आदेश जारी किया था और सफेद रंग की एंबेसडर कार सच में मेरे लिए वरदान साबित हुई। कार से मुझे होटल में रूके लोगों के लिए खाने-पीने की चीजें और दूसरी जरूरी चीजें जमा करने में मदद मिली। मुझे सामान लेने के लिए फैजाबाद के बाहरी इलाके में जाना पड़ा। कपूर ने कहा कि चूंकि कर्फ्यू पूरे फैजाबाद में लगा था, इस वजह से सभी टेलीफोन बूथ भी बंद पड़े थे।

 

सीढ़ियां कुछ फोटोग्राफर के लिए डार्क रूम बन गयी थी

उन्होंने कहा, यहां होटल में रूके अधिकतर पत्रकार होटल की एसटीडी सुविधा का इस्तेमाल कर अपने संपादकीय सहकर्मियों को खबरें लिखाते थे। वे सभी जरूरी सूचना देने के लिए करीब एक से डेढ़ घंटे बात करते थे। कपूर ने बताया कि होटल की सीढ़ियां कुछ फोटोग्राफर के लिए डार्क रूम बन गयी थी जहां वे तस्वीरें तैयार करते और फिर डाकघर जाकर उस दिन की तस्वीरें फैक्स से भेजते।

 

 

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