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तल्ख बयान, असहज जजमान

Rising At 8am | 12-Feb-2018 | Posted by - Admin

 

  • बयानवीर सपा नेता ने अब प्रधानमंत्री पर ही कर दी जातिगत टिप्पणी

  • पहले भी व्हिसकी में विष्णु और ठर्रे में हनुमान का दे चुके हैं बयान

  • कभी पार्टी को कभी आयोजकों के लिए संभालना हो रहा दिक्कत

   
SP Leader Controversial statements over Caste of Indian PM Narendra Modi

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

राजनीति के इस नए दौर में प्रसिद्धि के लिए सभाओं और रैलियों से कहीं ज्यादा मुफीद बिगड़े बोल बन गए हैं। हर पार्टी में इसके महारथी भी हैं जो अनायास ही इस तरह के बयान दे देते हैं कि हर तरफ चर्चा शुरू हो जाती है। मीडिया से लेकर आम लोग तक इन बयान में उलझ कर रह जाते हैं जबकि नेताजी अपने बयान से कन्नी काट लेते हैं। अब ताजा मामला ही लीजिए। राजधानी में एक कार्यक्रम में शिरकत कर रहे समाजावादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही जातिगत टिप्पणी कर दीं। इसे लेकर कार्यक्रम में हंगामा खड़ा हो गया।


दरअसल समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल के लिए यह कोई पहला मामला नहीं है। कुलभूषण जाधव के साथ आतंकी के समान सुलूक किए जाने, राज्यसभा में भगवान विष्णु का निवास व्हिसकी में तथा ठर्रे में भगवान हनुमान की निवास बता चुके हैं। मगर अहम सवाल यह है कि आखिर ये बयानवीर कार्रवाई से कैसे बच जाते हैं। यह किसी एक पार्टी की बात नहीं है। गुजरात चुनाव के दौरान हमने देश के संवैधानिक पद पर तैनात लोगों के बारे में ओछी बातें सुनी। खास बात यह है कि किसी बात खंडन नहीं हुआ बल्कि उसे भी चुनावी एजेंडे में तब्दील कर दिया गया। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी  समेत सभी दलों में इस तरह के लोग शामिल हैं। पिछले दिनों संसद में कांग्रेस नेता के खिलाफ प्रधानमंत्री सांकेतिक टिप्पणी के जवाब में तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद ने प्रधानमंत्री की तुलना दानव महिसासुर से ही कर डाली।

बयान एक, फसाने अनेक

दरअसल राजनीति में अब निजी टिप्पणी और ओछे बयानों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। तीखा हमले करने के मकसद वरिष्ठ नेताओं की जमान फिसलती है और फिर वही बयान बाद में उन्हीं के खिलाफ हथियार बनते हैं। गुजरात चुनाव हो या फिर उत्तर प्रदेश चुनाव इसे हम देखते आ रहे हैं। काश्मीर में बढ़ती आतंकी घटनाओं को लेकर भी अब तमाम नेता अपने हिसाब से बयान दे रहे हैं। यही हाल राम मंदिर को लेकर चल रही बहस में भी हो रहा है। केवल ऐसे तीखे शब्द खोजे जा रहे हैं कि दूसरा छलनी हो जाएं।

गुम हो चुकी है गंभीरता

राजनैतिक दलों के वरिष्ठ सदस्य ही तमाम वरिष्ठ लोग भी इन बयानों के पीछे सियासी होड़ में गंभीरता को दरकिनार कर दिए जाते हैं। सियासी नेता कार्रवाई के बजाए दूसरे का उदाहरण बताकर जस्टीफाई करने की जुगत में लगे रहते हैं तो आम लोग इसे इनका मानसिक दीवालियापन करार देते हैं। जनसंघ से लेकर कांग्रेस की सियासत और फिर भाजपा सरकार तक राजनीति के कई रंग देख चुके अस्सी वर्ष से अधिक उम्र के कारोबारी राजाराम कपूर कहते हैं, एक दौर अटल बिहारी, राम मनोहर लोहिया और जनेशवर मिश्र का होता था। केवल उनके समर्थक ही नहीं, बल्कि आलोचक तक उनका भाषण सुनने जाते थे। शब्दों का सटीक चयन और उपमाओं के जरिए प्रभावी तरीके से बात रखने की कला थीं। किसी बात किसी को चुभती नहीं थीं, लेकिन जिससे कही जाती थी, वह समझता भी था। मगर अब जो नेता आ रहे हैं, वह महज अपनी कमाई के लिए आ रहे हैं। उनके लिए चर्चा में बना रहना ज्यादा जरूरी है क्योंकि वही ब्रांडिंग है और कमाई के लिए वही मुफीद है।

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