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दि राइजिंग न्‍यूज

लखनऊ।

 

अगर सूबे के पुलिस प्रमुख की सुरक्षा में लगे जवान ही अपने हथियारों के बाबत जानकारी नहीं रखते हैं तो समझा जा सकता है कि सूबे के 22 करोड़ की हिफाजत में लगे पुलिस कर्मियों पर कितना भरोसा किया जा सकता है। बात महज दो दिन पहले की है कि जब पुलिस प्रमुख ने सुरक्षा में लगे कर्मियों से उन्‍हीं के हथियारों के बारे में जानकारी लेनी चा‍ही तो सारा भेद खुल गया। पुलिस प्रमुख ने तो अपनी सुरक्षा एटीएस के जवानों को सौंप दी मगर आम आदमी कहां जाए।

कई बार खुल चुकी है कलई-

पुलिस की इससे पहले भी कई बार कलई खुल चुकी है। मामला चाहे पुलिस लाइन में हथियार चलाने का रहा हो या फिर डकैतों से मुठभेड़ का ऐसे मौकों पर पुलिस फिसड्डी साबित हुई है। इसी तरह 18 जून 2016 को तत्‍कालीन एसएसपी मंजिल सैनी पुलिस लाइन पहुंची थीं। इस दौरान वहां मौजूद पुलिसकर्मियों से हथियारों से फायर करने को कहा। यहां पर एक भी पुलिस कर्मी ना तो रबर बुलेट फायर कर पाया ना आंसू गैस फायर हुआ, इतना ही नहीं फायरिंग के दौरान कई पुलिस कर्मियों के हाथ तक कांपने लगे थे।

हालांकि तत्‍कालीन एसएसपी ने जमकर लताड़ भी लगाई थी। इसी तरह 22 जनवरी को काकोरी में आए डकैतों से आमना-सामना होने पर पुलि‍सकर्मियों ने फायरिंग तक करना उचित नहीं समझा। जबकि देर रात कृष्‍णानगर, सरोजनीनगर, गाजीपुर, शहीदपथ जैसी जगहों पर यही पुलिस डकैतों से मुठभेड़ कर पीठ थपथपाती है।

राजनीतिकरण से गिरा स्‍तर-

प्रदेश  में थाने के दरोगा से लेकर सिपाही तक नेताओं के संरक्षण में तैनाती पा रहे हैं। इसलिए इनसे सुरक्षा और फायरिंग की बात करना तो बिल्‍कुल ही बेमानी होगी। जब सीधे नेता जी का हस्‍ताक्षेप शामिल है तो प्रशिक्षण और फायरिंग की क्‍या जरूरत। बात चाहे चुनाव के दौरान की हो या फिर किसी खास आयोजन में अपनी पार्टी का माहौल बनाने का हर जगह यही ध्‍यान दिया जाता है कि किस नेता की किस पुलिस वाले से बेहतर बनती है। इस बात को खुद भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह भी कबूल चुके हैं कि प्रदेश की पुलिसिंग में राजनीति हावी रही है। उन्‍होंने आम लोगों से सुधार के लिए समय देने की भी अपील की थी। एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन्‍होंने कहा था कि पुलिस के राजनीतिकरण को सुधारने में समय लगेगा।

आला अधिकारियों ने साधी चुप्‍पी-

पूरे मामले पर पुलिस के आला अधिकारियों ने चुप्‍पी साध ली है। एडीजी लखनऊ जोन राजीव कृष्‍ण और आइजी रूल्‍स एंड मैनुअल अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी द्वारा की गई कार्रवाई पर कुछ भी टिप्‍पणी करने से इनकार कर दिया। अब अधिकारी भले ही कुछ ना कहें, लेकिन आम आदमी की सुरक्षा में तैनात सिविल पुलिस को लेकर लोगों के बीच एक नई तरह की चर्चा तो उठ ही गई है कि डीजीपी ने अपनी सुरक्षा से सिविल पुलिस को हटाकर एटीएस कमांडो तैनात करने की योजना तो बना ली, लेकिन आम आदमी की सुरक्षा का क्‍या? वह तो आज भी इन्‍हीं सिविल पुलिस के भरोसे अपनी सुरक्षा की बाट जोह रही है।

“इस मामले को लेकर डीजीपी ने जो भी किया है वह सही है। आखिर एटीएस में शामिल जवान भी यूपी पुलिस के ही हैं। पहले भी यूपी पुलिस ही सुरक्षा कर रही थी और आज भी यूपी पुलिस ही सुरक्षा करेगी। इसलिए इसे दूसरे नजरिए से नहीं देखना चाहिए।”

एके जैन

पूर्व डीजीपी

 

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