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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

राजधानी में छह हजार से ज्यादा स्कूली वाहन और परिवहन विभाग के निर्देश पर सामने आए महज 529। यानी दस फीसद से भी कम। कहने को इनकी जांच हुई, लेकिन तीन साल से ज्यादा पुराने किसी वाहन में स्पीड गवर्नर लगा था न ही कहीं कोई अनुबंध मिला। मगर विभाग ने जांच की रस्म जरूर अदा कर दी।

खास बात यह है कि पिछले दो महीनों में तीसरी बार स्कूल वाहन चालकों को वाहनों को फिट कराने का अल्टीमेटम दिया गया है। केवल यही नहीं, कागजों पर मुस्तैद परिवहन अधिकारी 95 फीसद वाहन जांच कर अपनी पीठ भी ठोंक चुके हैं।

चौकिंए नहीं, यह आंकड़े परिवहन विभाग के होनहार अधिकारियों की टाल-मटोल और गुमराह करने वाली नीतियों को परिणाम हैं। सवाल यह है कि पिछले महीने जब 95 फीसद वाहन चेक कर लिए गए थे, तो फिर दोबारा वाहनों को बुलाने की जरूरत क्यों पड़ीं। स्कूलों के नाम पंजीकृत करीब 1550 वाहनों में जिन वाहनों की जांच हुई थी, उनकी रिपोर्ट कहां है। इसकी जानकारी अधिकारियों को भी नहीं है।

 

 

उधर, स्कूल वाहनों की जांच को लेकर शासन, परिवहन आयुक्त स्तर से कई बार हुए लेकिन हर बार जांच को एक-दो दिन में निपटा दिया गया।

दरअसल, पिछले सप्ताह केवल दो दिन वाहनों की जांच हुई, जबकि तीसरे दिन रविवार को वाहनों की जांच के नाम पर अभियान रोक दिया गया। अभियान भी ऐसा प्रभावशाली था कि विभाग के फिटनेस जांच पर बुलाने पर भी महज दस फीसद वाहन ही पुहंचे।

 

 

सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी संजीव गुप्ता के मुताबिक जो वाहन आए थे, उनकी फिटनेस जांच की गई। 28 वाहनों का फिटनेस रद्द किया गया। बाकी जिनमें कमियां थीं, उन्हें एक सप्ताह में दुरस्त कराने का अल्टीमेटम दिया गया है। मगर बाकी हजारों वाहनों क्या होगा, इसके लिए वह संभागीय परिवहन अधिकारी के निर्देश के मुताबिक कार्रवाई करने की बात कहते हैं।

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