Kedarnath Crosses Rs 50 Crore Mark at Box Office

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

नब्बे की रफ्तार पर आगरा एक्सप्रेस वे पर भागती स्कैनिया बस और आराम से लूडो खेलता चालक। सोशल मीडिया पर मामला पूरे दिन छाया रहा, लेकिन परिवहन निगम दोषी बस संचालक या चालक पर कार्रवाई नहीं कर सका। चालक पर कार्रवाई करें भी तो कैसे क्योंकि चालक अनुबंधित बस मालिक का है। लिहाजा यात्रियों के लिए जान हाथ लेकर सफर करना नियति बन गई है।

खास बात यह है कि इस घटना पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखे, लेकिन परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक पी गुरु प्रसाद और मुख्य महाप्रबंधक संचालन एचएस गाबा फोन पर बात करने को तैयार न थे।

सड़क सुरक्षा सप्ताह के पहले दिन आयोजित कार्यशाला में परिवहन निगम के तमाम अधिकारी सुरक्षित ड्राइविंग और हादसे रोकने की कार्यशाला में शामिल थे मगर अधिकारियों की अनदेखी के कारण होने वाले हादसों को लेकर उनका रवैया इसी से पता लगाया जा सकता है कि बाराबंकी के पास रामनगर में हादसे का शिकार हुई रोडवेज बस की जांच रिपोर्ट आज तक महाप्रबंधक एआर रहमान दबाए हुए हैं। उनसे रिपोर्ट की बावत पूछा गया तो मुस्करा कर टाल गए। जबकि प्रबंध निदेशक से लेकर मुख्यमहाप्रबंधक प्राविधिक तक इस पूरे मामले पर परदा डालने में जुटे हैं।

 

 

रोडवेज की बसों में बीटीएस बाक्स (व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम) के नाम पर प्रति टिकट करबी 37-38 पैसा ट्राइमैक्स कंपनी को दिया जा रहा है। इस कंपनी का दायित्व भी रोडवेज के पुराने सेवानिवृत्त अधिकारी उठा रहे हैं, जो अपने समय में कई अनुबंधों के लिए खासे चर्चित रहे थे। पूर्व प्रबंध निदेशक द्वारा उन्हें इस काम से हटाया भी गया था, लेकिन वह फिर पहुंच गए। आलम यह है कि एक तिहाई बसों में वीटीएस काम ही नहीं कर रहे हैं, लेकिन रोडवेज के कर्मठ अधिकारी पूरा भुगतान कर अपनी और कंपनी की जेब भर रहे हैं।

दरअसल, ये बानगी है कि उन तमाम कामों की जिनका हवाला मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए देते हैं, लेकिन हकीकत में जागरुकता की ये अजब कहानी लोगों के जान पर भारी पड़ रही है। यह नजारा भी सोशल मीडिया पर उस वक्त सामने आया जब आगरा एक्सप्रेस पर दिल्ली जा रही स्कैनिया बस का चालक नब्बे की रफ्तार पर बस चलाते हुए मोबाइल पर लूडो खेल रहा था।

 

इस समय सड़क सुरक्षा सप्ताह भी चल रहा है और देश में उत्तर प्रदेश सड़क हादसों में अव्वल है, लेकिन अधिकारी और जिम्मेदार विभाग कितने जागरुक हैं इसकी झलक सोमवार सड़क सुरक्षा जागरुकता सप्ताह के उद्घाटन पर में ही दिख गई थी, जब तमाम बड़े अधिकारी कार्यशाला में सोते दिखाई दिए। जबकि ये तमाम अधिकारी पिछले कई दिनों से सड़क सुरक्षा सप्ताह पर होने वाले आयोजन के लिए ही राजधानी में जमे हुए हैं। मंगलवार को स्कूलों में जाकर बच्चों को सुरक्षित परिवहन की शपथ  तो दिलाई गई और इसमें अधिकारियों खासी रुचि भी दिखाई।  

 

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तीन चार्ज मगर तीनों से बेजार

अब जरा परिवहन विभाग पर गौर करें। परिवहन विभाग में आयुक्त पद पर पी गुरुप्रसाद की तैनाती है। उनके पास ही रोडवेज के प्रबंध निदेशक का पदभार है और वहीं आयुक्त सड़क सुरक्षा है। यानी सड़क सुरक्षा के मुखिया भी वहीं है। अब जरा गौर करें। कैबिनेट से कामर्शिलय वाहनों में स्पीड गवर्नर लगाने के आदेश करीब डेढ़ महीने पहले हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश करीब 14 महीने पहले यानी फरवरी 2017 में दिए थे लेकिन आज तक इसका आदेश जारी नहीं हुआ।

रोडवेज बसों के हादसों में तीस फीसद तक वृद्धि दर्ज की गई। करोड़ों रुपये हर महीने आईटीएमएस पर खर्च हो रहे हैं, लेकिन उपकरण काम नहीं कर रहे हैं, लेकिन प्रबंध निदेशक उदासीन है। वहीं, सड़क सुरक्षा को लेकर विभाग की कारगुजारियां भी कम नहीं है। अपने हिसाब से अधिकारी नियमों की व्याख्या कर रहे हैं और उसी हिसाब से चल रहे हैं। मगर कार्रवाई सिफर है। सवाल यह है कि आखिर व्यवस्था क्या है। इतना जरूर है कि दफ्तर में अब सरकार के नुमाइंदें के तौर पर तमाम लोग जरूर विभाग का हाल चाल पूछते जरूर आते हैं।

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