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सपा में कलह: सियासी बिसात पर प्यादे हुए बादशाह

     
  
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  • सिरे नहीं चढ़ पा रहीं सुलह की कोशिशें

samajwadi party war


दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

10 जनवरी, लखनऊ।

दुष्यंत कुमार का शेर है... दुश्मनी लाख करो मगर इतनी गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त बने तो शर्मिंदा न हों। 


समाजवादी पार्टी में चल रही कलह और तनतनी को खत्म कराने के लिए प्रयासरत नगर विकास मंत्री और समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक मो. आजम खां जब यह शेर कहें तो उसके मायने ही अलग हो जाते हैं। यानी तमाम कोशिशों के बाद भी सुलह न होने के बाद अब संबंधों को कायम रखने की सलाह के तौर पर भी इस शेर को देखा जा सकता है।


दरअसल पार्टी में सुलह-समझौते के रास्ते अब करीब करीब बंद हो गए हैं। पार्टी पर कब्जे से शुरू हुई जंग अब पार्टी दफ्तर के कब्जे तक पहुंच गई है। पहले भले ही रविवार सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के कार्यकर्ताओं ने पार्टी कार्यालय पर ताला भी लगवाया था, मगर सोमवार सुबह ताला खोल लिया गया। फिर मुख्यमंत्री के निर्देश पर सोमवार को फिर यहां पर दूसरे गुट ने अपना कब्जा कर लिया। यहां तक कि मुलायम गुट के जिला सचिव रघुनंदन सिंह काका को घुसने से ही रोक दिया गया। बाद में वे कार्यालय के बाहर ही कुर्सी लगाकर बैठ गए। ऐसे में अहम सवाल यह हैकि आखिऱ इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सूत्राधार कौन लोग हैं।


सवाल यह है कि आखिर यह सब क्यों चल रहा है। दो दिन पहले दोनों गुटों (पिता-पुत्र) के बीच समझौता होने की बात होने लगी थी। मुलायम सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष मान लिया गया था लेकिन अचानक ही सारी स्थिति पलट गई, मानो कोई बातचीत न हुई हो। शनिवार रात से लेकर रविवार रात तक कमोबेश इसी तरह बैठकें चलती रही लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। सोमवार को मुलायम सिंह यादव दिल्ली चुनाव आयोग तक पहुंच गए। अपना पक्ष रखा। वहां से उन्हें अखिलेश यादव – गुट के रामगोपाल यादव द्वारा दिए गए प्रत्यावेदन तथा दावे की प्रति भी दी जा रही थी लेकिन अमर सिंह के कहने पर वह नहीं ली गई।


यानी दोनों गुटों के सूरमा अपने वजीरों के इशारे पर चल रहे हैं। यही कारण है कि कोशिशें किसी सिरे नहीं चढ़ रही हैं। प्रदेश, जनता और पार्टी तीनों को दरकिनार कर सियासत का जो खेल फिलहाल देखने को मिल रहा है, वह अभूतपूर्व है। खास बात यह है कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह महासचिव एवं सहयोगी अमरसिंह को अहम मान रहे हैं जबकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ से सियासी वर्चस्व की जंग की कमान राम गोपाल यादव ने अपने हाथ में ले रखी है। यही नहीं मुलायम सिंह यादव इस पूरे घटनाक्रम के लिए राम गोपाल यादव को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और अखिलेश को बरगलाने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ राम गोपाल यादव पूरे मामले की अमर सिंह को जिम्मेदार बता रहे हैं। उनकी हां में हां मुलायम सिंह के सहयोगी रहे नरेश अग्रवाल भी मिला रहे हैं।


यूं चला घटनाक्रम

6 जनवरी – मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच समझौते के लिए आजम खां मुलायम सिंह से मिले। शाम तक संयुक्त प्रेस कांफ्रेस पर भी सहमति बनी।

7 जनवरी – आजम खां फिर मुलायम सिंह से    मिले। उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष करार देते हुए समझौते की पहल।

8 जनवरी – मुलायम सिंह ने सपा कार्यालय पर ताला लगवाया। शिवपाल सिंह प्रदेशाध्यक्ष की नेमप्लेट लगाने के निर्देश दिए।

9 जनवरी – सपा कार्यालय पर मुख्यमंत्री के सुरक्षा कर्मियों का कब्जा। शिवपाल गुट के सदस्यों को घुसने से रोका।

9 जनवरी – मुलायम सिंह ने दिल्ली में चुनाव आयोग के समक्ष पक्ष रखा। साइकिल चुनाव चिन्ह पर अपना दावा पेश किया।



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