Neha Kakkar First Time Respond On Question Of Ex Boyfriend Himansh Kohli

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

 

इतना ही नहीं, जब इन वाहनों पर सख्ती की बात होती है या फिर उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन की बात होती है तो वह स्कूल बसों पर आयद बता दिए जाते हैं। इस पूरे खेल में अधिकारियों से लेकर गाड़ी स्वामी तक बच्चों को कमाई का जरिया बनाए हुए हैं।

 

शनिवार को कानपुर रोड पर आजाद इंजीनियरिंग कालेज में स्कूली बस के हादसे की जांच में इंजीनियरिंग कालेज में नन्हें मासूम बच्चे दिखाई दिए तो अचरच होना स्वाभाविक था। सवाल यह था कि क्या इंजीनियरिंग कालेज में छोटे -छोटे बच्चों को पढ़ाया जाता है। दरअसल पूरा खेल परमिट का है। टैक्स बचाने की खातिर तमाम स्कूलों ने अपना संस्तुति पत्र वाहन मालिकों को दे रखा है और उसके आधार पर वाहन स्कूल वाहन में तब्दील हो जाता है। स्कूल मान्यता प्राप्त है या नहीं,  स्कूल में बच्चे हैं या नहीं। इससे कोई सरोकार नहीं है। केवल सेटिंग में स्कूल के संस्तुति पत्र पर परमिट जारी हो रहा है। नतीजा यह है कि कई निजी स्कूल वैन - बसें जिन स्कूलों के बच्चे ढो रही हैं, उस स्कूल से उनका कोई कांट्रैक्ट तक नहीं है। यह सारा खेल परिवहन अधिकारियों की सहमति से चल रहा है। बदले में दोनों खुश हो रहे हैं।

ठेंगे पर बच्चों की सुरक्षा

 

परिवहन विभाग उदासीनता के कारण सबसे ज्यादा  असुरक्षित निजी वाहनों से स्कूल जाने वाले नन्हें –मुन्ने मासूम हैं। मारुति वैन में भेड़ –बकरियों की तरह से लादे गए 15 से 17 बच्चे। चालक के बगल में दो –तीन बच्चे। मगर परिवहन विभाग की आंख पर पर्दा ही रहता है। खास बात यह है कि इन मारुति वैन के चालक भी किशोर ही है यानी बिना लाइसेंस बिना अनुभव के ड्राइवर। जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक स्कूल वाहन चालक के पास कम से कम पांच साल का अनुभव होना जरूर होना चाहिए।

जांच का अता पता नहीं

 

शनिवार सुबह बंथरा में बिजनौर के नजदीक हुए हादसे की सूचना के बाद संभागीय परिवहन अधिकारी विदिशा सिंह ने जांच कराने का दावा तो किया लेकिन देर शाम तक मैडम का फोन ही उठा न यह सामने आ सका कि आखिर पूरा प्रकरण क्या था। उधर, बंथरा पुलिस ने प्रकरण को परिवहन विभाग से संबंधित बताकर पल्ला झाड़ लिया।  

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