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दि राइजिंग न्‍यूज

विकास वाजपेयी

लखनऊ।

 

क्या आप जानते हैं कि प्रदेश में होने वाले सड़क हादसों में नब्बे फीसद हादसों में चालकों के पास स्थायी पर्मानेंट ड्राइविंग लाइसेंस पाया गया। हादसों की विश्लेषण के बाद यह भी सामने आया कि पिछले एक साल में उत्तर प्रदेश में सड़क हादसे सबसे ज्यादा हुए और उसमें 19 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुईं लेकिन इसकी असल वजह रेवड़ी की तरह से ड्राइविंग लाइसेंस जारी होना ही माना जा रहा है। इसका अहम कारण यह है कि परिवहन दफ्तरों में संभागीय निरीक्षक (लाइसेंसी अथार्टी) की संख्या बेहद कम है।

 

अब जरा राजधानी के ही परिवहन दफ्तर पर गौर करें। ट्रांसपोर्ट नगर और देवा रोड आरटीओ कार्यालयों में कुल मिलाकर महज तीन आरआई है। इनमें एक के जिम्मे वाहनों की फिटनेस तो दूसरे पास वाहनों के टैक्स व स्थानांतरण का काम। एक आरआई के भरोसे ही लाइसेंस जारी करने का काम हो रहा है। यही नहीं, राजधानी में ही प्रतिदिन करीब सवा दो सौ लाइसेंस बनते हैं। अब जरा इसे कार्यालय अवधि से देखा जाए तो एक लाइसेंस पर महज दो से तीन मिनट का समय।

इसी तरह से फिटनेस ग्राउंड पर प्रतिदिन करीब सौ वाहनों की फिटनेस जांच होती है लेकिन वहां पर आरआई अमूमन दोपहर बाद पहुंचते हैं और तीन घंटे वाहनों की फिटनेस जांच होती है। यानी 180 मिनट में करीब सौ वाहनों की जांच। एक वाहन पर दो मिनट से भी कम का वक्त। ऐसे में अंदाजा लगाना स्वाभाविक है कि वाहनों की जांच किस तरह हो रही है और लाइसेंस जारी करने से पहले कितना आवेदक को परखा जा रहा है।

 

परिवहन विभाग में 124 आरआई के पद-उसमें से भी 96 पद खाली

प्रदेश के परिवहन दफ्तरों में महज 27 संभागीय निरीक्षक ही हैं। हालांकि विभाग के संभागों में नियतन 124 आरआई होने चाहिए लेकिन 75 फीसद पद रिक्त हैं। जबकि वाहनों की संख्या में उत्तर प्रदेश देश में ऊपरी पायदान पर आता है। इसके मुकाबले अन्‍य प्रदेशों पर नजर डालें तो राजस्‍थान में करीब 600 आरआई तथा महाराष्‍ट्र में 2000 और कर्नाटका में करीब 500 आरआई के पद है। जबकि इन तीनों ही राज्यों में वाहनों की संख्या उत्तर प्रदेश से कम ही है।

कमाई की खातिर बिना आरआई ही लाइसेंस हो रहे जारी

परिवहन विभाग में एआरटीओ दफ्तरों में अधिसंख्य स्थानों पर आरआई है ही नहीं। वहां पर एआरटीओ ही लाइसेंसी अथर्टी बने हुए हैं। जबकि नियमानुसार लाइसेंस जारी करने के लिए आरआई का होना अनिवार्य है। बिना तकनीकी जानकारी के वाहनों की फिटनेस हो सकती है न लाइसेंस जारी हो सकता है। मगर कमाई के चक्कर में यह तमाम एआरटीओ मुस्तैदी के साथ यह काम अंजाम दे रहे हैं और जेब भर रहे हैं। यह अलग बात है कि साल दर साल बढ़ते हादसे नियम विपरीत चल रहे इस गोरखधंधे का परदाफाश कर देते हैं। 

अधिकारी बोले

हादसों में 89 फीसद स्थायी लाइसेंसधारकों तथा लार्निंग लाइसेंसधारकों के महज 11 फीसद होने से ही यह साफ हो जाता है कि लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में कई विसंगतियां है। परिवहन आयुक्त कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक जिन मोटर ड्राइविंग स्कूलों के प्रशिक्षण प्रमाणपत्र पर चालकों को भारी व व्यावसायिक वाहन चलाने का लाइसेंस जारी किया जा रहा है, कम से उन वाहनों की हर महीने जांच होनी ही चाहिए। मगर ऐसा नहीं हो रहा है। यही नहीं, प्रशिक्षण प्रमाणपत्र मिलने के बाद ज्यादातर दफ्तरों में तो चालक को ड्राइविंग परीक्षा ली ही नहीं जा ही है। ऐसे में सुरक्षित वाहन चालन या सड़क सुरक्षा के लक्ष्य को पूरा करना मुश्किल ही नजर आता है।

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