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दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

मशहूर शायर मुजफ्फरअली की गजल है... सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यूं हैं, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है। मगर नवाबी शहर में लखनऊ में हालात सीने में घुटन और आंखों जलन वाले हो गए हैं। प्रदूषण के चलते खुली हवा में सांस लेना भी मुश्किल हो चला है लेकिन सरकारी महकमों की उदासीनता इस परेशानी को दोबाला ही कर रही है। एक तरफ सरकार विदेशी निवेशकों को निमंत्रित करने के लिए जमीन तैयार कर रही है तो दूसरी तरफ प्रदूषण की स्थिति इसमें रोड़ा बनती दिख रही है। अब जब विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट में राजधानी की लखनऊ का नाम आने के बाद भी सरकारी महकमे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ में प्रदूषण स्तर पीएम 138 तक पहुंच गया है।

 

विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट में दुनिया के सबसे ज्यादा 14 प्रदूषित शहरों में दस भारत के हैं। इस सूची में कानपुर पहले नंबर पर है तो लखनऊ सातवें पर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र वाराणसी तीसरे स्थान पर है। यहां पर प्रदूषण स्तर लगातार बढ़ रहा है। प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए सरकारी महकमों की सारी कवायद टोपी ट्रांसफर यानी एक दूसरे पर जिम्मेदारी थोपने तक ही रह गई है। लिहाजा किसी तरह से अंकुश नहीं लग पा रहा है। आपको याद होगा, कुछ महीने पूर्व ही न्यायालय ने भी बढ़ते प्रदूषण स्तर को लेकर फटकार लगाई थी। उसके बाद सरकारी महकमे कुछ दिन के लिए हरकत में दिखे लेकिन फिर सब पुरानी पटरी पर लौट आया। प्रमुख मार्गों पर ढेर भवन निर्माण सामग्री, उससे उड़ती धूल गर्दा, धुआं उगलते डीजल वाहन लेकिन उन्हे रोकने वाला कोई नहीं।

महज दिखावटी कार्रवाई

करीब तीन महीने पहले प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने कई निर्माण साइटों का निरीक्षण किया। वहां पर नोटिस जारी किए। कोर्ट की फटकार के बाद हरकत में आए महकमे ने नोटिस तो जारी कर दिए लेकिन उसके बाद सारा मामला सेट कर लिया गया। लिहाजा किसी भी निर्माण साइट पर प्रदूषण रोकने के लिए कोई इंतजाम हुआ न निर्माण बंद कराने की कार्रवाई। यही हाल परिवहन विभाग में भी रहा। डीजल चालित यात्री वाहनों को कई साल पहले प्रतिबंधित किया जा चुका है लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण में राजधानी में धड़ल्ले से डीजल वाहन फर्राटा भर रहे हैं। विभाग संसाधनों का रोना रहे हैं। यही राजधानी में कूड़ा प्रबंधन की हालत भी दयनीय है। प्रमुख मार्गों पर जहां –तहां कूड़े के ढेर नजर आते हैं। केवल कूड़े के ढेर ही नहीं बल्कि सड़क पर ही नगर निगम के सफाई कर्मचारी कूड़ा जला रहे हैं। मगर इसे देखने वाला कोई नहीं है।

 

बढ़ रहे हैं सांस और नेत्र रोगी

किंग जार्ज मेडिकल कालेज के चिकित्सकों के कारण बढ़ते प्रदूषण के सांस के रोगी बढ़ रहे हैं। अस्थमा, टीबी के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा आंखों पर भी प्रदूषण का प्रभाव पड़ रहा है और नेत्र रोगी भी बढ़े हैं। प्रदूषण के कारण कई तरह के इंफेक्शन भी लोगों को हो रहे हैं। केजीएमयू के पल्मोनरी विभाग के डा. वेदप्रकाश के मुताबिक प्रदूषण का असर अब साफ दिख रहा है। मरीज बढ़ रहे हैं। इसके लिए लोगों को भी जागरुक होना होगा, तभी इस पर प्रभावी रूप से अंकुश लगाया जा सकेगा।

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