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दि राइजिंग न्‍यूज

आशीष सिंह

लखनऊ।

प्रदेश में निजी स्‍कूलों पर लगाम लगाने और सस्‍ती शिक्षा देने का उद्देश्‍य केवल चुनावी जुमलेबाजी ही साबित हुआ है। यही कारण है कि उप मुख्‍यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा से लेकर जिला प्रशासन तक में कई बैठकें तो भले हुईं लेकिन निष्‍कर्ष नहीं निकला। पिछले साल से निजी स्‍कूलों की तानाशाही पर रोक लगाने के लिए चर्चाएं तो खूब हुई लेकिन बातें कानून का रूप नहीं ले सकीं। यही कारण है कि यह बात जहां से शुरू हुई थी एक साल बाद घूमकर फिर वहीं पहुंच गई। अब इसी का लाभ उठाते हुए राजधानी के निजी कॉलेजों ने दस प्रतिशत तक फीस बढ़ोतरी कर दी। वित्‍त मंत्री राजेश अग्रवाल ने एक सवाल के जवाब में केवल इतना ही कहा कि मामला शासन के संज्ञान में है और इस पर काम किया जा रहा है। तो वहीं जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने बताया कि बिना कानून के निजी स्‍कूलों पर हस्‍तक्षेप नहीं किया जा सकता है, क्‍योंकि इससे बिना मतलब का विवाद होगा। 


 

दिसंबर 2017 में उप मुख्‍यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा था कि जिन स्‍कूलों की वार्षिक फीस बीस हजार रुपए से अधिक होगी ऐसे स्‍कूलों की फीस नियंत्र‍ण के लिए नियमों में संशोधन करते हुए कानून बनाया जाएगा। इसके लिए नियमों को देखते हुए स्‍कूल, अभिभावकों, शिक्षकों और प्रबंधकों आदि से वार्तालाप के बाद प्रस्ताव को तैयार कराया गया था। जिसमें लोगों से सुझाव भी मांगे गए थे। इसी सुझाव के आधार पर कैबिनेट में पास कराने की बात कही गयी थी। इस कानून के पास होने के बाद निजी स्‍कूल सरकार के नियम के अनुसार ही वृद्ध‍ि करेंगे, ऐसा नहीं करने पर सरकार उनके स्‍कूल को अपने कब्‍जे में ले लेगी। फीस बढ़ाने के लिए जोनल फीस कमेटी की शिफारिश अनिवार्य थी।

प्रत्‍येक वर्ष की फीस को तीन चरणों में बांटे जाने से लेकर स्कूल छोड़ने पर बच्चे का काशन मनी भी वापस करना शामिल है। साथ ही साथ स्कूल में व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाली आय को स्कूल की आय मानी जाएगी। हालांकि इस कानून को 2018 के नए सत्र से लागू हो जाना था लेकिन वित्‍त मंत्री राजेश अग्रवाल के बयान के बाद स्‍पष्‍ट है कि उप मुख्‍यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा द्वारा किया गया दावा आज महज जुमलेबाजी ही साबित हुआ है। यही कारण है कि जिला प्रशासन इन स्‍कूलों पर कोई कार्रवाई करने की हि‍म्‍मत नहीं जुटा पा रहा है।

तय दुकान से खरीदारी का बनाते दबाव-

राजधानी के कई निजी स्‍कूल दुकानदारों से अपना कमीशन सेट किए हैं। स्‍कूल में बच्‍चे का प्रवेश होते ही उसे स्‍टेशनरी से लेकर स्‍कूली कपड़ों की जरूरत होती है। स्‍कूल प्रबंधन चुनिंदा दुकानों का नाम बताते हुए वहीं से खरीदारी करने का दवाब बनाते हैं। यहां पर जो सामान 50 रुपये का है वही खुले बाजार में 30 रुपये में उपलब्‍ध होता है इस‍के बाद भी अभिभावकों को मजबूरन यहीं से खरीदारी करनी पड़ती है। जिससे दुकानदार के साथ स्‍कूल प्रबंधन भी मोटा मुनाफा कमाते हैं। इस तरह के कई मामलों पर पिछले साल कार्रवाई भी हुयी थी। हालां‍कि उप मुख्‍यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा द्वारा बनाए गए ड्राफ्ट में इससे भी निपटने की बात कही गयी है।

“निजी स्‍कूलों में फीस नियंत्रण को लेकर सरकार बेहद गंभीर है। इसलिए एक ऐसा सिस्‍टम तैयार किया जा रहा है जिससे आम लोगों को लाभ हो फिलहाल मामला शासन में है इसलिए इस पर ज्‍यादा कहना उचित नहीं होगा, लेकिन यह स्‍पष्‍ट है कि परिणाम बहुत जल्‍द आने वाला है।”

राजेश अग्रवाल

वित्‍त मंत्री

    

निजी स्‍कूलों में फीस बढ़ाए जाने का मामला संज्ञान में है लेकिन प्रशासन इस पर कुछ नहीं कर सकता है। क्‍योंकि बिना कानून के कार्रवाई करने पर मामला न्‍यायालय तक पहुंच जाता है। इसलिए प्रशासन के हाथ बंधे हैं। शासन में मामला चल रहा है जैसे ही कोई आदेश आता है हम लोग उसी के अनुरूप कार्यवाई करेंगे।

कौशल राज शर्मा

जिलाधिकारी

 

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