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परिवहन विभाग में स्कूली परमिट में भी गड़बड़झाला

| Last Updated : 2018-04-11 10:13:19

 

  • खोजे नहीं मिल रहे स्कूल परमिट वाले निजी वाहनों का डेटा

  • अनुबंध पत्र में भी धोखाधड़ी


Reality of Checking of School vans and Buses by RTO Lucknow


दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने वाला संस्थान। मान्यता न ही कोई सरकारी अहर्ता लेकिन उसके अनुबंध पत्र पर भी जारी हो गया स्कूल परमिट।

 

बालागंज में कई साल पहले खुले एक बिना मान्यता के निजी स्कूल को बंद हुई कई साल हो चुके हैं लेकिन उस स्कूल के अनुबंध पत्र में आधा दर्जन से ज्यादा वाहन राजधानी में हजरतगंज से लेकर गोमतीनगर तक स्कूलों में बच्चे लाने–ले जाने का काम कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश है कि स्कूल वाहन पर स्कूल का नाम, फोन नंबर तथा चालक का विवरण दर्ज होगा लेकिन शायग ही कुछ वाहनों पर ऐसा हो। अन्यथा अनुबंध पर चल रहे वाहनों पर कोई नाम तक दर्ज नहीं है। आलम यह है कि वाहन किसी स्कूल का नाम है भी तो वह बच्चे दूसरे स्कूल के लेकर चल रहा है।

 

ये चंद उदाहरण हैं। दरअसल स्कूल परमिट के नाम पर यह घोटाला वर्षों से परिवहन विभाग में चल रहा है। स्कूल वाहनों के परमिट पर टैक्स आधा से भी कम हो जाता है। यानी सरकार को सामान्य वाहनों के मुकाबले आधा टैक्स मिलता है जबकि इन स्कूल वाहनों को डेडीकेटेड मानते हुए उनके लिए किराया तक निर्धारित नहीं है। नतीजतन स्कूली वाहनों का संचालन पूरी तरह से अराजक हो चुका है।

खास बात यह है कि पिछले तीन दिनों से मुख्यमंत्री के आदेश पर स्कूल वाहनों की जांच हो रही है लेकिन इन तीन दिनों में एक भी अनुबंधित निजी वाहन की जांच नहीं हुई है। संभागीय परिवहन अधिकारी प्रशासन अशोक कुमार सिंह के मुताबिक जिन निजी वाहनों को स्कूल परमिट मिला है, वह अनुबंध पर हैं। उनकी जांच होनी चाहिए लेकिन जो वाहन सीधे अभिभावकों से बच्चों को लेकर आने का कांट्रैक्ट कर रहे हैं, उन्हें स्कूल परमिट नहीं होना चाहिए। यह गलत है। ऐसे वाहन बंद होने चाहिए। इसके लिए प्रवर्तन अधिकारियों को कहा जाएगा।

 

डेढ़ हजार से अधिक हैं निजी अनुबंधित वाहन

राजधानी में डेढ़ हजार से ज्यादा निजी अनुबंधित वाहन स्कूल परमिट पर दौड़ रहे हैं। उनमें बसों से लेकर सैकड़ों मारुति वैन हैं। तमाम वाहन तो बिना परमिट ही बच्चों को स्कूल लाने – ले जाने का काम कर रहे हैं लेकिन भ्रष्ट जांच अधिकारियों के कारण इन वाहनों की जांच से हमेशा ही किनारा कर लिया जाता है। कभी पकड़े गए वाहनों को सीज करने के लिए स्थान न होने की दलील दी जाती है तो कभी संसाधनों की कमी। वर्तमान में चल रहे अभियान में कमोबेश यही दिख रहा है। खास बात यह है एक तरफ विभाग स्कूल के अनुबंध पत्र पर ही निजी वाहन को स्कूल परमिट देने का दावा करता है लेकिन दूसरी तरफ जांच के वक्त केवल उन वाहनों की बात करता है जो स्कूल के नाम पर पंजीकृत हैं। सवाल यह है कि जब स्कूल के अनुबंध पर कोई वाहन बच्चे ला रहा है और परमिट प्राप्त है तो स्कूल के नाम पर दर्ज कैसे नहीं है।

पूरा खेल कमाई का

दरअसल स्कूल वाहनों के परमिट का पूरा खेल परमिट अनुभाग से लेकर फिटनेस ग्राउंड तक वसूली का जरिया बन चुका है। वाहनों के प्रदूषण, फिटनेस, सीएनजी किट फिटनेस से लेकर ओवरलोडिंग तक सब परिवहन अधिकारियों के संरक्षण मे हो रही है। पिछले तीन दिन से स्कूलों की जांच कर रहे अधिकारियों को केवल स्कूल बसें ही मिल रही है। एक भी मारुति वैन या निजी बस विभाग को जांच में नहीं मिली। जबकि जिन स्कूलों में जांच हो रही हैं, वहां पर ही सैकड़ों बच्चे निजी स्कूल वाहनों से पहुंच रहे हैं मगर अधिकारियों को इनसे सरोकार ही नहीं रहता है।

 

खास बात यह है कि शासन के आदेश पर स्कूली वाहनों की जांच में भी परमिट शाखा ने खेल कर दिया। परमिट शाखा ने उन वाहनों की लिस्ट  तो तैयार कर दी जो स्कूलों के नाम पर पंजीकृत हैं लेकिन स्कूल परमिट प्राप्त निजी वाहनों की सूची पांच दिन बाद भी तैयार नहीं हो सकी है। यही नहीं, तीन दिन की जांच में एक दर्जन से अधिक स्कूल भी साफ इंकार कर चुके हैं कि उनके हैं उनके यहां कोई अनुबंधित निजी वाहन चल रहा है। ऐसे में परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली अपने आप सामने आ जाती है।

"जांच अभियान में अभी उन स्कूली वाहनों की जांच की जा रही है जो स्कूल के नाम पर ही पंजीकृत हैं। इसके अलावा स्कूलों में अनुबंध के आधार पर संचालित स्कूल परमिट प्राप्त निजी वाहनों की सूची भी तैयार कराई जा रही है। यह सही है कि बड़े बड़े स्कूलों में दर्जन भर भी बसें नहीं है। ऐसे में बच्चे जिन वाहनों से वे कैसे हैं और किस आधार पर संचालित हो रहे हैं, यह जांच विषय है। बुधवार से ऐसे वाहनों की भी जांच कराई जाएगी।"

विदिशा सिंह

संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रवर्तन)

 

 



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