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सोलर पावर समझौते पर ही सवाल

Rising At 8am | 22-Feb-2018 | Posted by - Admin
  • 67 हजार करोड़ का निवेश, साढ़े दस हजार मेगावाट बिजली उत्पादन का है लक्ष्य
  • पहले ही लग चुकी है  ऊर्जा क्षेत्र  में समझौतों पर रोक
  • विद्युत अधिनियम में बिडिंग के जरिए काम देने का प्रावधान
   
Questions Over Solar Power Agreement

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

इंवेस्टर सम्मिट के पहले ही दिन सौर ऊर्जा क्षेत्र में 67 हजार करोड़ से अधिक निवेश की घोषणा सवालों में उलझ गई है। कारण है कि विद्युत अधिनियम के तहत ऊर्जा क्षेत्र में बिडिंग के जरिए कार्य आवंटन का प्रावधान है। यही नहीं, विद्युत उत्पादन के लिए भी कोई एमओयू करने पर भी प्रतिबंध है। ऐसे सरकार द्वारा इस क्षेत्र में इतने बड़े निवेश को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। इसमें लक्ष्य को पूरा करने के लिए वर्ष 2022 का दिया जा रहा है जबकि देश में लोकसभा चुनाव अगले साल या इसी साल होने की संभावना है।

दरअसल सरकार ने जो समझौता किया है, उनमें चंद कंपनियां व औद्योगिक घराने शामिल हैं। सरकार समझौता होने की बात कह रही है लेकिन इसमें उत्पादन तय है न क्षेत्र। न ही बिजली की कीमत। यही नहीं, सरकार पहले ही  ऊर्जा उत्पादन के संबंध में किसी कंपनी से समझौते पर प्रतिबंध लगा चुकी है। समझौते के बजाए इसके लिए बिडिंग कराने तथा मानकों के अनुरूप सबसे कम लागत लेने वाली कंपनी को काम देने का प्रावधान है।

आल इंडिया पावर आफीसर्स एसोसिएशन पदाधिकारी तथा विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक ई. शैलेंद्र दुबे ने कहा कि सोलर पावर के क्षेत्र में इतना बड़ा निवेश कराया जाना स्वागत योग्य है। सोलर इनर्जी के लिए साढ़े दस हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन के लक्ष्य रखा गया है लेकिन इन कार्यों का आवंटन बिडिंग से ही होना चाहिए। समझौता होने के सीधा मतलब है कि काम चंद कंपनियां ही करेंगी। इससे बहुत अच्छे परिणाम नहीं मिलेंगे। इस तरह के समझौतों का हाल पहले भी देख चुके हैं।

कुछ कंपनियों का रहेगा दबदबा

विद्युत विभाग के जानकारों के मुताबिक सरकार जिस तरह से समझौतों को प्रस्तुत कर रही है, वह महज सब्जबाग की तरह से है। कारण है कि यह विद्युत अधिनियम में ही इसका प्रावधान नहीं है। सरकार केवल कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाने की घोषणा कर रही है जबकि इसलिए समय सीमा वर्ष 2022 बताया जा रहा है। इसमें अहम सवाल यह है कि भाजपा सरकार को कैसे यकीन है कि अगले लोकसभा चुनाव में फिर भाजपा आ रही है। इससे संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। पावर आफीसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष केबी राम के मुताबिक पावर कार्पोरेशन में कर्मचारियों को वेतन देने तक का पैसा नहीं बच रहा है। इसी कारण सारी व्यवस्था आउट सोर्सिंग पर दी जा रही है। ऐसे में सवाल यह है कि सौर ऊर्जा में निवेश करने वालों के लिए ट्रांसमिशन की लाइनें बनाने के लिए पैसा कहां से आएगा। दस साल पहले राजधानी में बिजली लाइनों को भूमिगत करने की योजना बनी थी लेकिन यह काम आजतक 25 फीसद भी नहीं हुआ है।

 

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