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दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

राजधानी में क्या राजभवन, क्या मुख्यमंत्री आवास और क्या हजरतगंज बाजार। हर जगह ई रिक्शा की भरमार। ट्रैफिक चलें या फंसे लेकिन ई रिक्शा के संचालन पर फिलहाल को लगाम नहीं है। ऐसा तब है जबकि संभागीय परिवहन प्राधिकण की बैठक से लेकर सड़क सुरक्षा की बैठक में ई रिक्शा के संचालन को नियंत्रित करने पर सहमति बनी। परिवहन विभाग दावा करता है कि ट्रैफिक पुलिस के साथ वार्ता हो चुकी है और ट्रैफिक पुलिस को प्रस्ताव तैयार करना है। जबकि ट्रैफिक पुलिस सिरे से ही सारी दलीलों को खारिज कर देती है। एसपी ट्रैफिक रविशंकर निम कहते हैं फिलहाल तो रोक लगाने या मुख्य मार्ग से अलग करने की कोई बात नहीं है। इसके लिए पहले ट्रायल किया जाएगा और ई रिक्शा संचालन से जुड़े संघों से बात की जाएगी। उनकी सहमति के मुताबिक प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।

दरअसल राजधानी में ई रिक्शा का संचालन भी एक सिंडीकेट के रूप से चुका है। भले ही सरकार ने इसे रोजगार परक बनाने के मकसद से इसके लिए संचालन के लिए तमाम शर्तें रखीं थी लेकिन इसका संचालन सिंडीकेट के हाथों में चला गया। लाइसेंस बनाने से लेकर वाहनों के पंजीकरण तक में परिवहन विभाग और कारोबारियों का सिंडीकेट काम कर रहा है। अधिनियम में रिक्शे के पंजीकरण से पहले स्वामी के पास लाइसेंस अनिवार्य किया गया था लेकिन होनहार परिवहन अधिकारियों ने रिक्शा चालकों को केवल लर्निंग लाइसेंस के आधार पर रिक्शे का पंजीकरण कर लिया।

नतीजा यह है कि राजधानी में करीब 15500 पंजीकृत तथा करीब सात हजार अपंजीकृत रिक्शे चल रहे हैं लेकिन इसमें नियमित लाइसेंस एक तिहाई के पास भी नहीं है। लाइसेंस के इस खेल की पड़ताल में सामने आया कि एक्ट के मुताबिक विक्रेता को चालक को रिक्शा चलाने  का प्रशिक्षण देना था लेकिन परिवहन दफ्तर में ही एक भी ई रिक्शा प्रशिक्षण वाहन के तौर पर दर्ज नहीं है। केवल कागजी प्रशिक्षण केंद्र के प्रमाणपत्र पर चालकों को लाइसेंस जारी कर दिए गए।

शोरुम से ही पूरी व्यवस्था

ई रिक्शा की बिक्री करने वाले प्रतिष्ठानों पर रिक्शा खरीदते वक्त ही सारी प्रक्रिया भी उपलब्ध हो जाती है। मसलन लाइसेंस-पंजीयन के लिए निर्धारित पैसा लेने के बाद एजेंट का नाम नंबर दिया जाता है। उस नंबर पर एजेंट आरटीओ दफ्तर में मिलता है जो सारी प्रक्रिया पूरी कर आसानी से लाइसेंस दिला देता है। इस काम में पैसा जरूर ज्यादा लगता है लेकिन काम एक से दो दिन में हो जाता है। यही नहीं तमाम एजेंसियां ऐसी हैं जो पंजीकृत रिक्शा बेचने के बजाए सीधे रिक्शे बेच रही हैं। यानी अवैध। मगर उनसे पूछताछ करने वाला भी कोई नहीं है।

रोजाना दो लाख की वसूली

राजधानी में संचालित करीब 20 हजार ई रिक्शा के जरिए ट्रैफिक पुलिस व क्षेत्रीय पुलिस और दबंग प्रतिदिन करीब दो लाख रुपये वसूल रहे हैं। पुलिस की इस मेहरबानी का अंदाजा हजरतगंज मुख्य चौराहे पर इलाहाबाद बैंक के गेट पर लगने वाले ई रिक्शा की लाइन से सामने आ जाती है। चंद कदम दूरी पर ट्रैफिक पुलिस का बूथ है। इस पर हरवक्त पुलिस भी रहती है लेकिन बैंक के गेट से ही आटो रिक्शा व ई रिक्शा का अघोषित स्टैंड चलता है। अब ट्रैफिक पुलिस इस पर कैसे लगाम लगायेगी या फिर क्या प्रस्ताव बनाएगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

"ई रिक्शा यातायात व्यवस्था में अवरोध पैदा कर रहे हैं। इनके चलते समस्याएं भी बढ़ी हैं। इन ई रिक्शा को मुख्यमार्ग से हटाकर संपर्क मार्गों पर चलाने पर सहमति बन गई है। इसका प्रस्ताव ट्रैफिक पुलिस को तैयार करना है और उसके बाद यह प्रस्ताव जिलाधिकारी तथा मंडलायुक्त को दिया जाएगा। जहां से संस्तुति मिलते ही कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी।"

अशोक कुमार

संभागीय परिवहन अधिकारी

 

"ई रिक्शा को मुख्य मार्ग से हटाने की अभी कोई योजना तो नहीं है। इस पर विचार जरूर किया गया है लेकिन उसके पहले जिन मार्गों पर उन्हें चलाया जाना है, वहां ट्रायल कराया जाएगा। इसके साथ ही ई रिक्शा संचालकों से भी बात की जाएगी और उनकी रजामंदी के बाद ही प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।"

रविशंकर निम

ट्रैफिक पुलिस अधीक्षक 

 

 

 

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