Box Office Collection of Dhadak and Student of The Year

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

बाहर से सीएऩजी (कम्प्रेस्ड नेचुरल गैस) का हरा रंग लेकिन संचालन डीजल से। राजधानी की आबोहवा के लिए डीजल टेंपों खतरनाक साबित हो रहे हैं लेकिन परिवहन विभाग केवल अपनी जेब भरने में लगा है। दिल्ली खतरकनाक स्तर पर प्रदूषण के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दस से पुराने डीजल वाहनों तथा पंद्रह साल पुराने पेट्रोल वाहनों को प्रतिबंधित कर दिया गया है लेकिन राजधानी में फिलहाल परिवहन विभाग को इससे कोई सरोकार नहीं है। और तो और डीजल चालित इन मामलों को लेकर जनसुनवाई पोर्टल के जरिए मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायत को भी अधिकारियों ने भ्रामक जवाब देकर भटका दिया।

राजधानी में करीब सात हजार डीजल चालित टेंपो धड़ल्ले से चल रहे हैं। कैसरबाग, सीतापुर रोड, नक्खास, राजाजीपुरम, ठाकुरगंज चारबाग और रायबरेली रोड सहित स्टैंड के इनका धड़ल्ले से संचालन हो रहा है। जबकि कागजों में ये वाहन राजधानी क्षेत्र के लिए प्रतिबंधित हैं। बावजूद इसके परिवहन विभाग आंख मूंद कर इनसे अपनी जेब भरने में जुटा है। नतीजा यह है कि इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है। नतीजा यह है कि इन वाहनों का हर इलाकों में संचालन हो रहा है। कई डीजल टेंपो बच्चों को लेकर स्कूल भी पहुंच रहे हैं लेकिन परिवहन विभाग को इनकी जांच के लिए समय तक नहीं मिल रहा है।

सीएम कार्यालय को कर दिया गुमराह

 

दरअसल मुख्यमंत्री के जनसुनवाई पोर्टल पर दर्ज एक शिकायत के सिलसिले में राजधानी में डीजल टेंपो के संचालन तथा इन डीजल चालित वाहनों के परमिट घोटाले की बावत शिकायत की गई थी। पोर्टल पर संभागीय परिवहन अधिकारी अशोक कुमार ने अपने जवाब में अवैध तरीके से पंजीकृत हुए करीब 390 डीजल टेंपो के प्रकरण के निस्तारण की बात कही। जबकि वास्तविकता में इनमें एक भी वाहन पंजीकरण आज तक रद नहीं किया गया है। बल्कि फर्जी एनओसी लगाकर उन्हें अंयत्र जिलों में स्थानांतरित दिखा दिया गया। यानी एक घोटाले को छिपाने के लिए दूसरा घोटाला अंजाम दे डाला गया। हकीकत में ये सारे टेंपो यही चल रहे हैं।

घोटालेबाज अफसर बन गए उप आयुक्त

 

खास बात यह है कि एक तरफ जनसुनवाई पोर्टल पर परमिट आवंटन प्रक्रिया को नियम विपरीत करार दिया गया। मगर इस पूरे प्रकरण में निलंबित किए गए तत्कालीन संभागीय परिवहन अधिकारी एपी सिंह वर्तमान में आगरा जोन के उप परिवहन आयुक्त हैं। सूत्रों के मुताबिक इस पूरे प्रकरण की जांच करने वाले अधिकारी तथा वर्तमान अपर आयुक्त ने अपनी जांच में उन्हें पाक साफ करार दिया था। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर उस वक्त पंजीकृत वाहनों को परमिट क्यों नहीं दिए जा रहे हैं। अगर प्रक्रिया अवैध थी तो फिर अधिकारी को तीन साल पहले कैसे बहाल कर पदोन्नति दे दी गईं।

जेब भरने में लगे हैं प्रवर्तन अधिकारी

 

राजधानी में प्रवर्तन शाखा में इस वक्त चार स्क्वायड है लेकिन पिछले लंबे समय से केवल जेब भरने का काम हो रहा है। जांच के नाम पर शासन स्तर से आदेश होने पर डग्गामार वाहनों व ओवर लोडिंग के अभियान जरूर चलाए गए लेकिन राजधानी में धुआं उगल रहे वाहनों की धरपकड़ महीनों से नहीं हुई है। नतीजा यह है कि डीजल चालित वाहन अब बच्चों को स्कूल पहुंचाने के काम भी लग गए हैं।

 

राजधानी में भी प्रदूषण स्तर बढ़ा है। इसके लिए निर्माण कार्यों के साथ डीजल वाहन भी जिम्मेदार हैं। इनके खिलाफ सघन कार्रवाई की जाएगी। इस संबंध में संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रवर्तन) से वार्ता कर अभियान चलाने को कहा जाएगा।

अशोक कुमार सिंह

संभागीय परिवहन अधिकारी  

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