Watch Making of Dilbar Song From Satyameva Jayate

दि राइजिंग न्यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

आपने कहावत जरूर सुनी होगी, सतसैया की दोहे - - -  घाव करें गंभीर। आज सियासी जंग में इन दोहे, कहावत और मुहावरों का जमकर इस्तेमाल हो रहा है।  चोर की दाढ़ी में तिनका, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे जैसे मुहावरे आपने जरूर बचपन में पढ़ें होंगे। मगर वर्तमान में यह सियासी लोगों के लिए विपक्षियों पर प्रहार करने का जरिया बन गए हैं। यानी अपनी भावना भी जता दी और बिना कहे ही मुनासिब उपाधि से विपक्षी को नवाज दिया। इस काम में हर पार्टी शामिल दिख रही है। अब ताजा उदाहरण पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बंगला है। इसे लेकर एक दूसरे पर जमकर तंज कसे जा रहे हैं और मुहावरे इस टशन में आग में घी साबित हो रहे हैं।

 

कभी मेट्रो व एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के वक्त राम नाम जपना जैसी कहावत के जरिए सत्तारुढ़ भाजपा सरकार को कठघरे में खड़े करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अब खुद ही निशाने पर हैं। मामला है उनके द्वारा खाली किया गया सरकारी बंगला। बंगले में हुई तोड़फोड़ व सरकारी संपत्ति के नुकसान को लेकर सरकार उन पर हमलावर है। इस जंग की चिंगारी उस वक्त शोला बन गई जब राज्यपाल राम नाईक ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सरकारी संपत्ति के नुकसान के मामले में सरकार से कानून सम्मत कार्रवाई करने का पत्र भेज दिया। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस मामले में चारो ही तरफ से घिरे दिखाई दे रहे हैं। मगर उनकी स्थिति को देखते हुए सत्तारुढ़ पार्टी भी पूरी तरह से आक्रामक है।

बंगले को लेकर चल रहे प्रकरण में अखिलेश यादव बुधवार को मीडिया के समक्ष आए और उन्होंने इसे भाजपा द्वारा उपचुनावों में हुई हार की खीज करार दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री के ओसएडी तथा आईएएस अधिकारी के बंगले में जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि बंगले में तोड़ फोड़ साजिशन कराई गई और मकसद केवल उन्हें अपमानित करना है। शायद वह खुद भूल गए कि लोकसभा में गुजरात के गधों की तुलना उन्होंने कहां और किससे की थीं।

 

अखिलेश यादव के इन आरोपों की प्रतिक्रिया भी त्वरित देखने को मिली, जब प्रदेश सरकार के मंत्री एवं प्रवक्ता सिद्धार्थ नाथ सिंह ने इसे उल्टा चोर कोतवाल डांटे वाली मिसाल के अनुरूप बताया। उन्होंने कहा कि जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव प्रतिक्रिया दे रहे हैं, वह चोर की दाढ़ी में तिनका जैसा है। यानी कहीं कुछ तो जरूर है। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले में एक दीवार टूटी है, सवाल यह है कि उस दीवार के पीछे क्या था। अगर वहां कुछ था नहीं तो फिर दीवार तोड़ने की जरूरत क्या थी।

सियासत के बिगड़े बोल

वैसे वर्तमान में सियासत में अब मुद्दे और विकास कार्यों की जगह विवादित शब्दों और टिप्पणियों ने ले लिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद तो यह चलन बन गया। इसमें हर पार्टी अपने हित साध रही है। आपको याद होगा जब पिछले लोकसभा के चुनाव में गुजरात के शेरों से लेकर गधों तक जिक्र आया। इसे किस तरह से इस्तेमाल किया गया। अभी पिछले दिनों अचानक ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में जिन्ना का जिन्न निकाला लेकिन मकसद न पूरा होने के कारण जिन्न वापस यूनीवर्सिटी में भी समा गया। विवादित टिप्पणी कर अचानक ही लोगों को आकर्षित करने की य़ह परंपरा लगातार फलफूल रही है और आने वाले लोकसभा चुनावों तक यह सियासी भाषा और कितने निम्न स्तर पर जाएगी, यह देखने वाली बात होगी।

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