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दि राइजिंग न्यूज़

फोटो- अभय वर्मा

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

आसमान से बरसती आग। पारा भी करीब 44 डिग्री सेल्सियस और सूखा हलक। इस गर्मी में राजधानी के सबसे विकसित क्षेत्र गोमतीनगर, इंदिरानगर और रिंग रोड पर पानी को तरसते लोग। जी हां, राजधानी में विकास की ऐसी कागजी चकाचौंध फैल रही है कि राहगीरों को पानी की एक बूंद मिलना दुश्वार है। एक तरफ हम स्मार्ट सिटी की बात कर रहे हैं। कागजों पर स्वच्छता मिशन चल रहा है लेकिन इस पूरे अभियान में पेयजल गायब है। इसी का जायजा लिया दि राइजिंग न्यूज की टीम नें। हमने शुरुआत की मुख्यमंत्री आवास के नजदीक स्थित लाल बत्ती चौराहे से। चिलचिलाती धूप में जो देखने को मिला वह . . .

लालबत्ती चौराहे से हम चले तो करीब एक किमी दूर स्थित लखनऊ कैंसर अस्पताल के बाहर एक प्याऊ मिला। निजी संस्थान द्वारा लगाए गए इस प्याऊ में इधर से गुजरने वाले लोग अपना गला तर करते दिखे। अन्यथा सड़क के दोनों ही तरफ दूर –दूर तक कोई सार्वजनिक नल था न प्यास बुझाने का कोई इंतजाम। यहां से पालीटेक्निक चौराहे की तरफ बढ़ने पर हमें उसके बाद कहीं पानी नहीं मिला। इतना जरूर था कि कुछ स्थानों पर ठेलों पर सजी पानी से भरी पन्नियां जरूर दो – दो रुपये में बिकती मिलीं। इनमें पानी कैसा और कितना शुद्ध है, इसका कोई ठिकाना नहीं है। हालांकि इसके बाद अगला प्याउ हमें मिला, लोहिया पार्क विवेकखंड चौराहे के नजदीक। यहां पर भी एक व्यावसायिक भवन में एक वाटर कूलर लगा है। इसमें अमूमन सभी लोगों को पानी मिल जाता है। हालांकि सरकारी व्यवस्था कोई नहीं है।

इसके बाद अगला सार्वजनिक नल या हैंडपंप फिर मुंशीपुलिया चौराहे के आसपास ही दिखा। इसके पहले अगर पानी की आवश्यकता हो तो केवल खरीदने का विकल्प लोगों के पास रहता है। मुंशीपुलिया चौराहे से खुर्रम नगर चौराहे के बीच करीब ढाई किमी तक रिंग रोड पर कहीं पेयजल उपलब्ध नहीं है। कोई प्याउ लगा है न ही सार्वजनिक नल। यानी अगर अचानक जरूरत पड़ जाए तो पानी भी खोजना पड़ेगा। यही कुछ हाल खुर्रम नगर चौराहे वायरलेस चौराहे तक है। यहां पर डंडहिया बाजार मोड़ के पास एक हैंडपंप है लेकिन वह अर्से से खराब पड़ा है। कमोबेश यही स्थिति फिर आगे भी दिखती है।

दरअसल यह तस्वीर है राजधानी में विकास की चकाचौंध की। पानी की व्यवस्था सुनिश्चित कराने को लेकर नगर निगम और जल संस्थान एक दूसरे के बीच जिम्मेदारी की टोपी को सरकाते रहते हैं। इंतजाम कौन करेगा, यह कभी तय नहीं हो पाया। यह अलग बात है कि इस पूरे मार्ग पर हर इलाके में फुटपाथ लेकर सड़क नगर निगम के कारिंदों ने कमाई के बेच रखी है। मुंशीपुलिया निवासी विजय बताते हैं कि पहले पालीटेक्निक चौराहे से मुंशीपुलिया चौराहे के बीच कई हैंडपंप होते थे मगर अब कोई नहीं। जहां हैंडपंप होते थे, वहां पक्के निर्माण हो चुके, लिहाजा इधर से गुजरने वालों को पानी खरीदना ही पड़ता है।

पारे चढ़ने के साथ बढ़ रहा पानी का धंधा

आईटी कालेज चौराहा हो या फिर माननीय के निवास स्थल दारुलशफा। गर्मी बढ़ने के साथ हर इलाके में पानी का धंधा भी जमकर फलफूल रहा है। खुलेआम चौराहों पर प्लास्टिक पतली पन्नी में भर पानी बेचा जा रहा है। खास बात यह है कि ठेलों के नीचे प्लास्टिक कंटेनर या डिब्बों में पानी भरा रहता है और भरी पन्नी बिकने के बाद दोबारा भर कर सजा दी जाती है। यह पानी आ कहां से रहा है, किसी को नहीं मालूम। यह शुद्द है या नहीं, इसकी भी जानकारी नहीं लेकिन मरता क्या न करता, प्यास से परेशान लोग इसे खरीदने को मजबूर हैं।

 

इस पूरे पंद्रह किमी की दूरी में सार्वजनिक नल न होना या पेयजल उपलब्ध न होना गलत है। कई संस्थाएं प्याउ लगाने के लिए संपर्क कर रही है। शीध्र ही इस मार्ग पर पेयजल की व्यवस्था कराई जाएगी। बाकी प्लास्टिक की पन्नी में पैक होकर बिक रहे पानी की गुणवत्ता जांच कराई जाएगी। अवैध रूप से पानी बेचने वालों पर कार्रवाई होगी।

संयुक्ता भाटिया

महापौर

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