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दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

देश भर में वाहनों की अधिकतम रफ्तार सौ किमी प्रति घंटा से ज्यादा नहीं हो सकती है। यह नियम और प्रतिबंध भारत सरकार का है और इसके लिए वर्ष 2014 में अधिसूचना भी जारी हुई थी। भारत सरकार की तरफ से  अधिकतम रफ्तार जरूर तय कर दी गई लेकिन उसके उलट पिछले तीन सालों में वाहनों की टेक्नालाजी और माडलों में जबरदस्त बदलाव व अधुनिकता आई। चौपहिया वाहनों के लिए स्पीड भले ही 100 किमी प्रतिघंटा की है लेकिन सड़क पर इस समय ऐसी कारों की भरमार है जो ढाई सौ –तीन सौ किमी प्रतिघंटा या उससे भी ज्यादा से रफ्तार से फर्राटा भर सकती है। सवाल यह है कि सरकार एक तरफ 100 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार तय कर रही है जबकि वाहन कंपनियां उससे तीन –चार गुना ज्यादा रफ्तार से चलने वाले वाहनों को उतार रहीं है।
 

यह बात इस वजह से भी अहम हो जाती है जब सड़क सुरक्षा को लेकर दुनिया में भारत की स्थिति काफी दयनीय है। उत्तर प्रदेश तो देश में ही नहीं बल्कि दुनिया में कुख्यात हो चुका है। बावजूद इसके लिए नए माडलों और ज्यादा शानदार फर्राटा भरने वाली कारें धड़ाधड़ सड़क पर आ रही है। सवाल यह है कि जब अधिकतम गति तय है तो फिर ज्यादा स्पीड वाली कारों को उतारे जाने का मकसद क्या है। यानी वही मिसाल, चोर से कहो चोरी करें, पुलिस को पहरेदारी करें।

सीमित साधनों के भरोसे परिवहन विभाग भी सड़क हादसों की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाने में नाकाम ही दिखाई देता है। ताबड़तोड़ हादसे हो रहे हैं लेकिन सरकार इसके लिए कम ही संजीदा दिखाई देती है। परिवहन विभाग की सड़क सुरक्षा शाखा के एक अधिकारी भी मानते हैं कि जब वाहनों का आकर्षण ही उसकी रफ्तार बन रही है तो फिर गति पर नियंत्रण कैसे लगाया जा सकता है। या तो सरकार यह सुनिश्चित करें कि कारें भले ही कितनी रफ्तार पर चल सकती हों लेकिन उनकी अधिकतम गति सौ – सवा सौ के ऊपर नहीं जाएगी। अगर ऐसा नहीं है तो केवल परिवहन विभाग और पुलिस के भरोसे लगाम लगाना कोई आसान काम नहीं है।

 

दोपहिया के साठ किमी प्रति घंटा की रफ्तार

कार ही नहीं बल्कि दो पहिया वाहनों के लिए साठ किमी प्रति घंटा की अधिकतम रफ्तार तय है। अमूमन दोपहिया वाहन इससे ज्यादा गति में नहीं चलाए जाने चाहिए लेकिन अब तो बाइक डेढ़ सौ से दो सौ किमी प्रतिघंटा रफ्तार से चलने वाली आ चुकी है। युवा भी इन वाहनों के जरिए हवा से बातें कर रहे हैं। अक्सर यह रफ्तार जान के लिए खतरा भी साबित हो रही है मगर उस पर लगाम नहीं लग पा रही है।

हाईएंड बसों में भी नियम दरकिनार

रोडवेज में चल रही हाई एंड की बसें स्कैनिया, वोल्वो, प्लेटीनम सेवा की बसों की रफ्तार भी सौ से अधिक रहती है। अधिकारी भी एक्सप्रेस वे और अच्छी रोड का हवाला देने के साथ ही लोगों को कम समय में गंतव्य तक पहुंचाने की दलील देकर इसे सही ठहराते हैं लेकिन हकीकत में ये बसें भी निर्धारित रफ्तार से अधिक गति में चल रही है। ये सरकारी सेवा की बसें हैं, इस कारण इनकी रोक टोक भी नहीं होती है। हालांकि रोडवेज अधिकारी बसों में लगे जीपीएस और बीटीएक्स बाक्स के जरिए गति की मानीटरिंग करने का दावा करते हैं लेकिन ज्यादा गति में शायद ही किसी चालक पर कार्रवाई की गई हों।

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