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मुलायम से बड़े खिलाड़ी निकले रामगोपाल

     
  
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दि राइजिंग न्‍यूज

11 जनवरी, लखनऊ।

राजनीति में एक कहावत है कि राजनीतिक हवा के रुख को समझने वाला चुनावी नतीजों से पहले ही सत्ता की रेस जीत चुका होता है। हवा के इस रुख को न समझ पाने और इसकी मार झेलने वालों में इंदिरा गांधी को सबसे प्रमुख माना जाता है। वे आपातकाल के बाद हुए चुनाव में अपनी सीट तक गंवा बैठीं थीं वहीं इस रुख को समझने वालों में सबसे ताजा उदाहरण लालू प्रसाद यादव का हैजो पार्टी के अंदर-बाहर लाख विरोध के बाद भी नीतीश कुमार के हो गए गए और अरसे बाद राज्य की सत्ता में वापसी की।


वर्तमान में सपा में छिड़े विवाद के बीच सपा नेता प्रोफेसर रामगोपाल यादव भी कहीं न कहीं हवा के रुख को समझने वालों में से ही एक माने जा रहे हैं। उन्होंने पार्टी के अंदर अखिलेश यादव के पक्ष में हवा के जिस रुख को कई महीनों पहले पहचान लिया था उसे एक जनवरी को हुए पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में करीब 90 फीसदी विधायकों की उपस्थिति ने सही साबित कर दिया।

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1988 में राजनीति में कदम रखने से पहले रामगोपाल यादव इटावा के एक डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर थे। उन्होंने पहले भौतिकी और फिर राजनीतिक विज्ञान में स्‍तानकोत्‍तर की डिग्री हासिल की और दोनों ही विषयों के प्रोफेसर रहे। आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने पीएचडी भी की है। बताया जाता है कि मुलायम सिंह यादव उनकी योग्यता की वजह से ही उन्हें पार्टी में लाए थे। कई साक्षात्कारों में खुद रामगोपाल यादव बताते हैं, 1987-88 के समय मुलायम राजनीति में आने को लेकर मेरे काफी पीछे पड़े रहे और फिर एक रात वे इटावा में उनके घर आए और आदेश देते हुए बोले बसरेहर ब्लॉक प्रमुख चुनाव के लिए कोई भी उम्मीदवार नहीं मिल रहा है तो तुम वहां अपना नामांकन कर आओ।  रामगोपाल के मुताबिक वे कुछ कह पाते इससे पहले मुलायम अपनी जीप में बैठे और चले गए। इस चुनाव को जीतने के बाद उन्हें इटावा से ज़िला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ाया गया। इसमें मिली जीत के बाद वे सक्रिय राजनीति में आ गए।


केंद्रीय स्तर पर रामगोपाल यादव के कद को इस बात से भी समझा जा सकता है कि अन्य पार्टियों के नेता भी दिल्ली में सपा से जुड़े मुद्दों पर मुलायम के बाद सिर्फ रामगोपाल से ही बात करते थे।


जानकारों के मुताबिक मुलायम सिंह यादव अच्छी तरह से जानते थे कि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति को तो अपनी तरह से देख सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें एक पढ़े लिखेअंग्रेजी की समझ रखने वाले विश्वसनीय व्यक्ति की जरूरत है। हमेशा परिवार को तवज्जो देने वाले मुलायम को इसके लिए अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव से बेहतर दूसरा कोई नजर नहीं आता था। उन्होंने 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन के बाद पार्टी का संविधान बनाने से लेकर तमाम तरह का दस्तावेजी और दिल्ली की राजनीति का सारा काम रामगोपाल को सौंप दिया। इसी साल उन्हें पहली बार सपा की ओर से राज्‍यसभा भी भेजा गया।


मुलायम सिंह रामगोपाल यादव को ये सभी जिम्मेदारी सौंप कर पूरी तरह निश्चिंत थे। कई मामलों में वे पार्टी नेताओं से यह तक कहते नजर आते थे, प्रोफेसर साहब जो कर रहे हैं उन्हें करने दो वह सब कुछ सही ही करेंगेक्योंकि हम सभी भाइयों में एक वही हैं जो आगरा विश्वविद्यालय तक पहुच पाए।


वर्तमान समय में सपा में चल रही उठापटक में रामगोपाल यादव अखिलेश खेमे की ओर से मुख्य भूमिका में हैं। पिछले तीन महीनों में सपा में पूरी तरह से बिखराव न होने से पहले मुलायम सिंह यादव ने उन्हें दो बार पार्टी से निकाला और वापस ले लिया। जानकारों की मानें तो मुलायम प्रोफेसर साहब की राजनीतिक काबिलियत और पार्टी में उनकी अहमियत को अच्छे से जानते हैं। उन्हें यह भी पता है कि उनसे पूरी तरह से अदावत मोल लेना ठीक नहीं है क्योंकि वे ही एक ऐसे शख्स हैं जो अखिलेश को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत पार्टी की बागडोर थमा सकते हैं।


रामगोपाल यादव को काफी पहले ही पार्टी के टूटने का अंदाजा हो गया था और इसलिए वे चुनाव आयोग से जुड़े कुछ पूर्व और वर्तमान अधिकारियों के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के वकीलों से भी इस बारे में सलाह ले चुके थे।


रामगोपाल यादव को दूसरी बार पार्टी से निकालने के बाद मुलायम का यह डर सही भी साबित हुआ है। इसके बाद उन्होंने एक जनवरी को सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया और मुलायम सिंह को अध्यक्ष पद से हटाते हुए अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया। साथ ही इस दौरान शिवपाल यादव का भी पद छीन लिया गया। जानकारों की मानें तो भले ही मुलायम गुट इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक बताए लेकिन सपा का संविधान लिखने वाले प्रोफेसर साहब ने सब कुछ नियमों के तहत ही किया है।


सपा के संविधान में लिखा है कि अगर पार्टी के 40 फीसदी निर्वाचित पदाधिकारी राष्ट्रीय अधिवेशन की मांग करते हैं तो पार्टी महासचिव राष्ट्रीय अधिवेशन बुला सकता है। साथ ही इस अधिवेशन को जायज ठहराने के लिए रामगोपाल ने पार्टी उपाध्यक्ष किरणमय नंदा से इस अधिवेशन की अध्यक्षता कराई। बताया जाता है कि सपा के संविधान में यह भी लिखा है कि किसी भी अधिवेशन में अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष शामिल नहीं होता है तो उसमें उपाध्यक्ष का शामिल होना अनिवार्य है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात यह है कि पार्टी अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया या उस पर महाभियोग चलाने के बारे में पार्टी संविधान में कुछ भी नहीं कहा गया है जिसका फायदा उठाते हुए रामगोपाल यादव ने अखिलेश यादव के हाथों में पार्टी की बागडौर सौंप दी।


अखिलेश यादव के साथ बेहतर तालमेल का कारण

रामगोपाल यादव की अखिलेश यादव से करीबियों का कारण परिवार में इन दोनों का ज्यादा शिक्षित होना भी माना जाता है। अखिलेश बचपन में जहां चाचा शिवपाल के ज्यादा करीब थे वहीं ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने के बाद उनका चाचा रामगोपाल यादव से अच्छा तालमेल बनने लगा। अखिलेश को राजनीति में आने के लिए भी उन्होंने ही सबसे पहले जोर डाला था। साथ ही 2012 में वे अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के लिए शिवपाल यादव का बुरा बनने से भी नहीं हिचके थे। हालांकिकुछ लोग अखिलेश के साथ उनके बेहतर तालमेल की एक बड़ी वजह अमर सिंह को भी मानते हैं क्योंकि अमर सिंह को अखिलेश और रामगोपाल दोनों ही पसंद नहीं करते हैं।


2010 में अमर सिंह को सपा से निकाले जाने के बाद एक बार फिर दिल्ली की राजनीति में रामगोपाल का कद बढ़ गया था. लेकिन 2016 में अमर सिंह की सपा में वापसी ने प्रोफेसर साहब को परेशान कर दिया। अमर सिंह के पार्टी में आने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर रामगोपाल यादव से ज्यादा मुलायम अमर सिंह को तरजीह देने लगे थे। गठबंधन से लेकर तमाम मामलों में अमर सिंह ही मुख्य भूमिका निभाने लगे थे। रामगोपाल यादव को लगने लगा था कि अमर सिंह की वजह से पार्टी में उनकी अहमियत तो कम हो ही रही है साथ ही नेताजी भी परिवार से दूर होते जा रहे हैं।


उधर कहा जाता है कि अखिलेश यादव भी अपनी मां के निधन के बाद मुलायम सिंह यादव की दूसरी शादी और प्रतीक को उनके बेटे का दर्जा दिलाने के लिए अमर सिंह को ही जिम्मेदार मानते हैं। जानकारों की मानें तो अखिलेश इससे पहले घर और राजनीति दोनों में ही खुद को मुलायम का इकलौता वारिस मानते थे लेकिन प्रतीक के आने के बाद उन्हें इन दोनों जगहों पर ही चुनौती का सामना करना पड़ा।


भले ही प्रतीक की राजनीति में दिलचस्पी न होलेकिन माना जाता है कि उनकी पत्नी अपर्णा यादव को अमर सिंह और शिवपाल यादव चुनावी टिकट देकर अखिलेश के खिलाफ इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। यही कारण हैं कि रामगोपाल के साथ-साथ अखिलेश भी अमर सिंह को पसंद नहीं करते हैं।

 



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