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दि राइजिंग न्‍यूज

आशीष सिंह

लखनऊ। 

 

पहले समाजवादी पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी के श्रेय बटोरने का जरिया बनी लखनऊ मेट्रो राजधानीवासियों को नहीं भा रही है। आलम यह है कि करीब दो हजार करोड़ रुपये की लागत से बनीं लखनऊ मेट्रो बेपनाह घाटे में चल रही है। मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने जिस मेट्रो का उद्घाटन किया था, वह यात्रियों  की कमी से जूझ रही है। मेट्रो को अमूमन 12-13 हजार मुसाफिर रोजाना मिल रहे हैं जबकि उनसे दस लाख रुपये की रोजाना आय हो रही है। जबकि इसी रूट पर आटो रिक्शा से लेकर आटो –टेंपो के परमिट की कीमतें कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

लखनऊ मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (एलएमआरसी) के जनसंपर्क अमित कुमार श्रीवास्‍तव ने बताया कि यात्रियों में शुरुआत की अपेक्षा कुछ गिरावट आई है। हालांकि मेट्रो को लाभ हानि से जोड़ना गलत है। आगे का कॉरीडोर बनने के बाद इससे अधिक लोग जुड़ेंगे और कहीं ज्यादा बेहतर परिवहन माध्यम बनेगा। अभी शुरूआती दौर है और जैसे जैसे रूट का विस्तार होगा, यात्री भी बढ़ेंगे। दरअसल अभी मेट्रो ट्रांसपोर्ट नगर से चारबाग तक करीब आठ किमी मीटर की दूरी तय कर रही है। इसके निर्माण में दो हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।

हालांकि की मेट्रो का संचालन शुरू होने से पहले लोगों में जबरदस्त क्रेज था। गत पांच सितंबर को मेट्रो का उद्घाटन के बाद शुरुआती दिनों में इसमें खासी भीड़ भी देखने को मिली लेकिन फिर यात्री की संख्या लगातार कम हुई है। केवल वीक एंड में यात्रियों की संख्या में बीस फीसद तक इजाफा हो जाता है। इसके भी कई वजह हैं। दरअसल मेट्रो का किराया सामान्य साधनों के मुकाबले ज्यादा है। इसके अलावा मेट्रो स्टेशन से वांछित स्थान के लिए लोगों को पैदल जाना पड़ता है जबकि आटो –टेंपो में सीधे वांछित स्थान पर ही लोग पहुंचते हैं।

भारी पड़ रहा किराया  

 

ट्रांसपोर्ट नगर से चारबाग तक एक आदमी का किराया 30 रुपये है। यदि ट्रांसपोर्ट नगर से चार लोग चारबाग स्‍टेशन तक आए तो यह खर्च 120 रुपये हुआ। इसमें स्‍टेशन के प्‍लेटफार्म तक का ही किराया शामिल हुआ और स्‍टेशन तक पैदल अलग से चलना पड़ा। अब इसके एवज में टैक्सी का किराया 60 रुपये ही हुआ और यह उसे स्‍टेशन परिसर तक पहुंचाएगा। इस तरह से लगभग आधे से कम रेट में उतनी ही दूरी तय हो रही है। इसका असर पड़ा और मेट्रो से लोगों का मोह भंग होने लगा। बीते एक माह के दौरान पांच लाख से अधिक लोगों ने मेट्रो को चुना जिससे कुल कमाई लगभग एक करोड़ के आसपास हुई। जबकि स्‍टेशनों में बिजली आपूर्ति और रखरखाव पर भारी खर्चा हुआ। अकेले बिजली का बिल ही 50 लाख के ऊपर का हो गया। इस तरह मेट्रो की जेब शुरुआत से ही ढ़ीली होने लगी है।

“शुरूआत में लोगों की भीड़ मेट्रो तक आई थी। अभी भी प्रतिदिन 15 हजार के आसपास लोग आ रहे हैं। हालांकि कुछ गिरावट आई है लेकिन इसे लाभ-हानि से जोड़ना गलत है। सरकारी योजना का लक्ष्‍य लाभ कमाना नहीं बल्कि लोगों को सुविधा देना है। आगे का कॉरिडोर तैयार होने के बाद लोग मेट्रो से जुड़ेंगे और सब कुछ बेहतर होगा। शुरूआती चरण में दो हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। पूरा बजट कुल 6880 करोड़ रुपये का है।”

अमित श्रीवास्‍तव

पीआरओ, मेट्रो

 

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