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दि राइजिंग न्‍यूज

लखनऊ।

 

नगर निकाय चुनाव में कम मतदान के कारण सुर्खियों में आई राजधानी में हड़कंप की स्थिति है। राज्य निर्वाचन आयोग से लेकर जिला प्रशासन कारण तलाशने में जुटा है और उससे भी कहीं ज्यादा शिद्दत से दोषी को चिन्हित करने की कवायद चल रही है। आलम यह है कि रविवार शाम को मतदान समाप्त होने के बाद मामला तूल पकड़ने लगा था और रात तक तीन बीएलओ निलंबित कर दिए गए।

सोमवार को पूरे दिन कम मतदान को लेकर समीक्षा होती रही। मतदान के प्रतिशत ने निर्वाचन आयोग तथा प्रशासन के तमाम जागरुकता अभियान को भी तार-तार कर दिया।

 

 

दरअसल, नगर निकाय चुनाव में हजारों वोटर अपना मत डालने से महरूम रह गए। सुबह से मतदान केंद्रों पर हंगामा शुरू हो गया। आलम यह था कि आठ-दस साल पहले गुजर चुके (मृत) लोगों के नाम तो वोटर पर्चियां थी लेकिन जिंदा लोग के नाम गायब थे। इसकी मुख्य वजह बीएलओ द्वारा इस बार मतदान पर्चियां पहुंचाने में बर्ती गई लापरवाही भी रही।

 

राजधानी के तमाम इलाकों में वोटर पर्चियां पहुंचीं ही नहीं। नतीजतन मतदान के लिए लोग जब पोलिंग स्टेशन पहुंचे, तभी उन्हें नाम गायब होने का पता चला। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इसकी मॉनीटरिंग किस तरह से हो रही थी। बीएलओ क्या कर रहे थे, इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन थे, यह सबसे अहम है।

 

चौक, ठाकुरगंज, नख्‍खास, नाका, इंदिरानगर, बटलर पैलेस, गोमतीनगर, जैसे कई जगहों पर मतदाता वोटर पर्ची लेकर तो पहुंचे, लेकिन मतदाता सूची में नाम ना होने के कारण उन्‍हें मायूस हो कर लौटना पड़ा। वीवीआइपी क्षेत्रों तक में भी बीएलओ ने मतदान पर्ची नहीं पहुंचाई।

अकेले बटलर पैलेस के एक बूथ में 5128 मतदाताओं के सापेक्ष केवल एक हजार ही वोट पड़े। हालांकि बाद में जिलाधिकारी ने यहां पर तैनात महिला बीएलओ सहित तीन अन्‍य को निलंबित कर दिया है।

 

 

दफ्तरों में परिसीमन, बीएलओ के भरोसे लिस्ट

दरअसल, निकाय चुनाव में खामियों की मुख्य वजह नगर निगम के अधिकारियों द्वारा दफ्तर में बैठकर किया गया परिसीमन था। परिसीमन पर सैकड़ों आपत्तियां जरूर आईं लेकिन उनमें लगभग सभी बिना किसी सुनवाई के निस्तारित कर दी गईं। नतीजा यह है कि कई वार्डों में भूगोल बदल गया। कई पार्षद चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी ही परिसीमन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की भी आरोप लगा रहे हैं।

यही नहीं, मतदाता सूची के सत्यापन के लिए बीएलओ तैनात जरूर किए गए लेकिन बीएलओ वार्ड में किस मतदान केंद्र पर थे, यह आखिर तक तय नहीं था। यही नहीं सबसे ज्यादा नाराजगी तो इस बात को लेकर थी कि जो लोग विधानसभा व लोकसभा चुनाव में मतदान कर चुके थे, उन्हें मताधिकार का प्रयोग नहीं करने दिया गया क्योंकि सूची में नाम नहीं था। यानी लोकसभा-विधानसभा तथा नगर निगम की मतदाता सूचियों में अंतर लोगों के गले नहीं उतर रहा है।

 

यही नहीं वोटर कार्ड के बावजूद वोट देने से वंचित लोग तो इसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। उधर, जिलाप्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दरअसल वोटर लिस्ट में गड़बड़ी की मुख्य वजह विधानसभा-लोकसभा तथा नगर निगम की मतदाता सूची में अंतर होना है। दो चुनाव भारत निर्वाचन आयोग कराता है लेकिन निकाय चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है, लिहाजा इन सूचियों में भिन्नता रहती है। निर्वाचन आयोग से सूचियों को एक करने के लिए कभी कोई प्रयास नहीं होता है। यही कारण इतने बड़े पैमाने पर दिक्कतें देखने को मिलीं।

 

 

वोटर लिस्‍ट में गड़बड़ी की जांच करेगा मंडलायुक्‍त

निकाय चुनाव में वोटर लिस्ट में इतनी अनियमितताएं पाए जाने पर लोगों का आक्रोश बूथ पर हुए बवालों के रूप में देखने को मिला। यही नहीं आम जनता के साथ-साथ दिग्‍गज नेताओं के भी नाम वोटर लिस्‍ट से गायब मिले। इन गड़बड़ियों से राज्‍य निर्वाचन आयोग सख्‍त नाराज है जिसके चलते इसकी जांच मंडलायुक्त को सौंपी गई है। आयोग ने एक हफ्ते में इसकी रिपोर्ट भी मांगी है।

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