Neha Kakkar First Time Respond On Question Of Ex Boyfriend Himansh Kohli

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

आग का क्या है, पल दो पल में लगती है, बुझते बुझते एक जमाना लगता है . . । राजधानी में नगर निगम चुनाव का हाल भी कुछ यूं ही हो चला है। चुनाव हो चुका है बस मतदान कम हुआ। मतदान कम होने से अलावा सबसे बड़ी बात यह थी कि सांसद, मंत्री आदि लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब थे। मोहल्ले में पूरा पूरा ब्लाक गायब हो गया तो सैकड़ों ऐसे लोग मतदाता सूची में प्रकट हो गए, जिनकी सालों पहले मृत्यु हो चुकी थी। लिहाजा अब हड़कंप मचा हुआ है। कम मतदान के कारण भी खोजे जा रहे हैं। दरअसल  लोक सभा में 54 फीसद मतदान और विधानसभा चुनाव 2017 में 58.5 फीसद मतदान मगर नगर निगम चुनाव में महज 28 फीसद मतदान। वहीं मतदाता और वही बीएलओ (बूथ लेवल अधिकारी) मगर सैकड़ों मतदाताओं के नाम सूची से ही गायब। दरअसल यह सवाल अब हर जगह चर्चा में है। सवाल यह है कि आखिर विधानसभा और लोकसभा में मतदान करने वाले मतदाता सूची से कैसे गायब हो गए। सरकार से लेकर राज्य निर्वाचन आयोग तक सियासी दलों के निशाने पर हैं। सांसद, मंत्री से लेकर राजभवन के स्टाफ के लोगों के नाम भी मतदाता सूची से गायब होने के बाद अब इसकी जांच भी शुरू हो गई। प्रशासन हलकान है और राज्य निर्वाचन आयोग ने कमिश्नर को जांच के आदेश भी दे दिए हैं। मगर अहम सवाल यह है कि लोकसभा चुनाव तथा विधानसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग ने जो मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराया, उसके लिए माकूल वक्त दिया गया लेकिन निकाय चुनाव में राज्य निर्वाचन आयोग ने महज डेढ़ महीने में प्रक्रिया पूरी करा दीं।

अब जरा राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के पुनरीक्षण व अनंतिम प्रकाशन पर गौर करें। छह सितंबर से दस सितंबर 2017 तक पांच दिन का समय बीएलओ से लेकर क्षेत्रीय अधिकारियों की की नियुक्ति तथा प्रशिक्षण के लिए समय तय किया गया था। उसके बाद 11 सितंबर से तीन अक्टूबर 2017 यानी 32 दिन का समय बीएलओ को घर जाकर सर्वे व गणना करने के लिए दिया गया था। नए मतदाताओं के आनलाइन आवेदन के लिए 11 सितंबर से 25 सितंबर तक का समय तय किया गया था। जबकि नौ सितंबर से तीन अक्टूबर तक बीएलओ को आनलाइन आवेदनों की घर –घर जाकर जांच करनी थी। इसके बाद चार अक्टूबर से आठ अक्टूबर तक मतदाताओं की कंप्यूटराइज सूची तैयार की जानी थी और नौ अक्टूबर को उसका प्रकाशन किया गया। प्रकाशित मतदाता सूची पर आपत्तियां व दावों व उनके निस्तारण के लिए नौ अक्टूबर से लेकर 15 अक्टूबर 2017 तक समय दिया गया था। उसके बाद 16 व 17 अक्टूबर 2017 को पुनरीक्षीत सूची की फीडिंग करनी थी तथा 18 अक्टूबर 2017 को अनंतिम प्रकाशन कर दिया गया।

 

प्रशासन के कई अधिकार मानते हैं कि मतदाता सूची को तैयार करने की हड़बड़ी और जल्द काम पूरा करने की चाहत में ही यह घटना हुई कि सैकड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गायब हो गए। राज्य निर्वाचन आयोग ने कार्यक्रम तो जारी कर दिया लेकिन बाकी सारी जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दीं। जिला प्रशासन द्वारा बनाए सहायक निर्वाचन अधिकारियों की देखरेख में काम हुआ। उसके बाद जो हुआ वह सामने हैं। सवाल यह है कि जो मतदाता सूची विधानसभा में तैयार की गई थीं, वह निर्वाचन आयोग की होती है लेकिन नगर निगम में यह सूची से कहां से आई। केवल बीएलओ स्तर पर गड़ब़ड़ी होती जो फिर नगर पंचायतों में रिकार्ड मतदान क्यों होता। वहां पर भी मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम भी बीएलओ द्वारा किया गया था।

फिलहाल अब गड़बड़ी के जिम्मेदारों की तलाश शुरू हो गई। सवाल यह है कि इसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी भी तय होगी। आखिर इतनी जल्दबाजी में पूरा कार्यक्रम कैसे निर्धारित किया गया जबकि इस पूरे कार्यक्रम के दौरान नवरात्र से लेकर मोहर्रम जैसे संवेदनशील पर्व भी थे।

समाजवादी पार्टी ने दिया ज्ञापन

 

नगर निगम चुनाव में कम मतदान तथा प्रमुख व विशिष्ट लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब होने के मामले को गंभीर बताते हुए समाजवादी पार्टी ने इसे सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी की साजिश करार दिया है। राज्य निर्वाचन आयुक्त को ज्ञापन देकर समाजवादी पार्टी के नेताओं ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की है। राज्य निर्वाचन आयुक्त कार्यालय पहुंच समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम तथा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि मतदाताओं के नाम गायब होना भाजपा की साजिश है। इसके जरिए चुनाव को प्रभावित करना चाहती थीं।

   

 

 

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