Actress Sara Ali Khan Reached Dehradun Police Station With Amrita Singh In Property Dispute

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

नफासत व नजाकत का शहर यानी राजधानी लखनऊ में मतदाताओं की उदासीनता ने इस बार अपनी जीत की पक्का मान रहें तमाम निकाय चुनाव के प्रत्याशियों की सांस अटका दी हैं। लोगों की उदासीनता का आलम कुछ यूं था कि पिछले निकाय चुनाव के मुकाबले इस बार मतदान प्रतिशत दशमलव एक फीसद कम हो गया। परंपरागत वोटों के भरोसे चुनाव में भाग्य आजमाने उतरे तमाम प्रत्याशियों के लिए मतदाताओं का यह रुख अप्रत्याशित ही रहा और नतीजा यह रहा कि जीत का खम भरने वाले नेताओं की रौनक मतदान समाप्त होते होते गायब होती चली गई। दरअसल इस बार प्रदेश के निकाय चुनावों को प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की अग्निपरीक्षा की तरह से माना जा रहा है और इसका प्रभाव गुजरात तक पड़ने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में मतदाताओं ने सत्तारुढ़ पार्टी के लिए सस्पेंस पैदा कर दिया है।

 

वैसे इस बार निकाय चुनाव में पार्टियों व प्रत्याशियों का रुख भी मतदाताओं के प्रति सामान्य जैसा नहीं था। परंपरागत वोटों के आधार बना कर लड़े जा रहे चुनाव में सत्तारुढ़ पार्टी को छोड़ दिया जाए तो बाकी दल भी कुछ खास दिलचस्पी नहीं ले रहे थे। नतीजा यह रहा कि लोगों भी इस बात को पचा नहीं पा रहे थे कि जो प्रत्याशी उनसे मत की कामना कर रहा है, वह क्षेत्र तक आने को तैयार नहीं है। तमाम इलाकों में लोग यह शिकायत करते मिलें। ऐसे में डोर टू डोर लोगों के घर तक अपनी हाजिर लगाने वाले प्रत्याशी गेम चेंजर का रोल भी अदा कर सकते हैं। दरअसल पिछले दिनों से राम मंदिर प्रकरण के अचानक चर्चा में आने के बाद मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण भी देखने को मिला। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कम वोटिंग औऱ वोटों के बिखराव का फायदा भाजपा को मिला था लेकिन रविवार को हुए निकाय चुनाव में ऐसा कुछ खास नहीं दिखा। ऐसे में समाजवादी पार्टी को परंपरागत वोट का फायदा मिलता जरूर दिख रहा है। ऐसे में सत्तारुढ़ पार्टी के प्रत्याशियों के लिए यह भारी भी पड़ सकता है।

 

गेमचेंजर साबित हो सकती है आप

 

मतदान के दौरान कई इलाकों में निकाय चुनाव में शामिल आम आदमी पार्टी गेम चेंजर साबित हो सकती है। कारण है कि व्यापारिक घराने से प्रत्याशी उतारे जाने के कारण वैश्य वोटों का कुछ हिस्सा मिलना तय माना जा रहा है। कई बाजारों के अलावा मोमिन अंसार सभा और आम जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर मैदान में उतरी आप कई क्षेत्रों में मजबूती से लड़ती दिखी। ऐसे में आप को गेम चेंजर के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल आप को मिलने वाले मत से सत्तारुढ़ भाजपा के वोटों के ज्यादा प्रभावित होने के आसार दिख रहे हैं और यह समाजवादी पार्टी के लिए संजीवनी भी साबित हो सकता है।

 

मगर इतिहास तो खिलाफ

 

राजधानी लखनऊ का इतिहास रहा है कि यहां पर मेयर पद अमूमन सत्तारुढ़ पार्टी का प्रत्याशी हारता रहा है। यानी कि जिस पार्टी की सरकार रहती है, मेयर पद उसका नहीं होता बल्कि विपक्ष से आता रहा है। उप मुख्यमंत्री एवं राजधानी के पूर्व मेयर डा. दिनेश शर्मा भी बसपा व समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान विजयी हुए थे। ऐसे में देखने वाला होगा कि क्या सत्तारूढ़ पार्टी का मेयर प्रत्याशी जीत हासिल करेगा या एक बार फिर मतदाता इतिहास दोहराएंगे।  

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