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परिवहन विभाग का भ्रष्टाचार कर रहा शहर बीमार

Rising At 8am | 16-Nov-2017 | Posted by - Admin

 

  • करीब सात हजार परमिट के सापेक्ष में पंद्रह हजार वाहन
  • आरटीओ दफ्तर में ही पंजीकृत वाहन साढ़े 11 हजार
   
Latest and Trending Updates over Pollution in Lucknow

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

नवाबी शहर यानी राजधानी लखनऊ आजकल पूरे देश में चर्चा का केंद्र है। चर्चा में होने की वजह है यहां प्रदूषण और घातक आबोहवा। मगर इस प्रदूषण में अगर किसी विभाग की अनदेखी सबसे ज्यादा दिखती है तो वह है परिवहन विभाग। परिवहन विभाग दावे भले ही कुछ करें लेकिन विभाग के रिकार्ड सारी कलई खोल देते हैं। राजधानी के आरटीओ दफ्तर में तीन पहिया सवारी वाहन करीब 11700 पंजीकृत है। ऐसा तब है जबकि केंद्रीय प्रदूषण आयोग से यहां पर आटो रिक्शा व टेंपो की संख्या सीमित कर रखी है। अब सवाल यह है कि मानकों के विपरीत वाहनों का पंजीकरण कैसे हो गया। विभागीय अधिकारी इसके लिए साफ्टवेयर में कुछ दिक्कत को बताते हैं लेकिन हकीकत यह है कि विभाग ने एक परमिट या संस्तुति पत्र की फोटोकापी तक पर वाहन पंजीकृत कर रखे हैं। अब यही वाहन विभाग की गले की हड्डी बन चुके हैं।

 

विभागीय अधिकारियों के मुताबिक राजधानी में आटो रिक्शा के लिए 4646 तथा टेंपो के लिए 2250 वाहनों की संख्या निर्धारित है। यानी करीब सात हजार सवारी वाहन मगर विभाग में दर्ज वाहनों की संख्या 11 से ज्यादा है। जबकि करीब तीन –हजार हजार वाहन आसपास के जिलों के हैं जो राजधानी में सवारी ढो रहे हैं। उन्नाव, बाराबंकी, सुल्तानपुर, हरदोई आदि जिलों से पंजीकृत वाहन चल रहे हैं। पूरे शहर में इनका संचालन हो रहा है लेकिन परिवहन विभाग संसाधनों का रोना रो रहा है और ट्रैफिक पुलिस इन्हें पकड़ने का दायित्व आरटीओ का बता रही है। यह अलग बात है कि वसूली दोनों ही विभाग धड़ल्ले से कर रहे हैं।

डीजल वाहनों के नाम पर सीएम कार्यालय भी गुमराह

 

डीजल वाहनों के नाम पर परिवहन विभाग जनता ही नहीं, सीएम कार्यालय को गुमराह करने में भी बाज नहीं आ रहा है। राजधानी में संचालित अवैध डीजल टेंपो की बावत विभाग स्पष्ट जानकारी देने बच रहा है। इस संबंध में जनसुनवाई पोर्टल पर आयी एक शिकायत में करीब तीन साल पहले घोटाले के तहत जारी 1186 डीजल परमिट संस्तुतियों के प्रकरण को निस्तारित करार दे दिया गया। जबकि हकीकत में इनमें करीब चार सौ टेंपो बिना परमिट के ही पंजीकृत कर दिए गए। बाद में उन्हें सीएनजी में कन्वर्ट कराने कराने का मौका दिया गया। मगर पंजीयन किसी का रद नहीं किया गया। अर्थात बिना परमिट वाले वाहन सड़क पर धड़ल्ले से चल रहे हैं। इसी तरह से संभागीय परिवहन प्राधिकरण से सीएनजी टेंपो –आटो की आयु पंद्रह साल कर दी, नतीजा यह रहा कि जो वाहन डीजल चालित होने के कारण रद हो गए थे और उनके रिप्लेसमेंट परमिट जारी हो गए थे। वह दोबारा फर्राटा भर रहे हैं। नाका, चारबाग, आलमबाग में इस तरह से एक नंबर व फोटोकापी आरटी –परमिट पर वाहन पकड़े भी गए लेकिन सारा मामला भ्रष्टाचार के चलते दबा दिया गया।

साफ्टवेयर पर ही दोषारोपण

 

 राजधानी में सात हजार परमिटों की अनुमति के सापेक्ष में साढ़े 11 हजार वाहनों के पंजीयन की बावत अधिकारी इसे वाहन चार साफ्टवेयर की खामी बता देते हैं। कर्मियों के मुताबिक साफ्टवेयर में वे वाहन भी दिखाए जा रहे हैं जिनके पंजीयन रद कर दिए गए थे। मगर कितने वाहनों के पंजीयन रद हुए, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है।

प्रवर्तन दस्ता खोजों तो जानें

 

वैसे डीजल चालित वाहनों को प्राश्रय देने में परिवहन विभाग प्रवर्तन दस्ता भी कहीं पीछे नहीं है। सड़क ही नहीं. दफ्तर में प्रवर्तन शाखा के अधिकारियों को खोजना मुश्किल ही नहीं बहुत मुश्किल है। हालांकि आरटीओ दफ्तर में संभागीय परिवहन अधिकारी प्रवर्तन विदिशा सिंह के अलावा दो एआरटीओ तथा पीटीओ तैनात है लेकिन सरकार के आदेश से परे हैं। भले ही बाकी विभागों व अधिकारियों के लिए सुबह दस –बारह का समय दफ्तर में अनिवार्य रूप से उपलब्ध के निर्देश हैं लेकिन परिवहन विभाग की प्रवर्तन शाखा के लिए इसके मायने नहीं है। हालात तो यह है कि प्रवर्तन शाखा के अधिकारियों की बावत प्रशासिनक शाखा के अधिकारी तक नहीं दे पाते हैं। शासन –प्रशासन भले ही प्रदूषण को लेकर तमाम एहतियात बरतने तथा कार्रवाई के आदेश जारी कर रहा हो लेकिन प्रवर्तन अधिकारी गुरुवार को भी दोपहर 12 बजे तक नदारद थे। हालांकि एक अधिकारी पहुंचे भी लेकिन वह एक वीआईपी की खिदमत में।

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