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इन जजों के बयान पर मचा हाहाकार

     
  
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judges and their controversial statements

दि राइजिंग न्‍यूज

आउटपुट डेस्‍क।

वैसे तो इंडियन जुडिशियरी सिस्‍टम का राजनीति और विवादों से बहुत ज्‍यादा लेना देना नहीं होता है लेकिन बीते कुछ सालों में हालात कुछ बदल से गए हैं। कुछ मौकों पर ऐसे जज आए जिनके बयानों पर खूब बवाल हुआ।

ऐसे ही पांच जजों के बारे में व उनके बयान के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं।

1. जस्टिस मार्कंडेय काट्जू

जस्टिस काट्जू सुप्रीम कोर्ट में जज थे। वो प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया (पीसीआई) के चेयरमैन भी रह चुके हैं।

वह अपने विवादित बयान के लिए आए दिनों सुर्खियों में रहते हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि 90 फीसदी भारतीय मूर्ख हैं।

उन्होंने कहा था, "मैं कहता हूं कि 90 प्रतिशत भारतीय बेवकूफ हैं। उनके सिर में दिमाग नहीं होता। उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। मात्र दो हजार रुपये देकर दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़काए जा सकते हैं।"

वो फेसबुक पर अपने विचार आए दिन व्यक्त करते रहते हैं।

2. जस्टिस टीएस ठाकुर

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश जस्टिस टीएस ठाकुर ने जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा था।

उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री न्यायपालिका को कमज़ोर कर रहे मुद्दों पर तवज्जो दें, खासतौर पर जजों की नियुक्ति के मसले पर।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री देश से जुड़े हर विषय पर बोलते हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन उन्हें न्यायपालिका की समस्याओं पर भी बोलना चाहिए।

जस्टिस ठाकुर दिल्ली में मुख्यमंत्रियों और राज्यों के मुख्य न्यायाधीशों की बैठक में जजों की कमी की बात करते हुए इतने भावुक हो गए थे कि उनका गला भर आया था।

3. जस्टिस करनन

अदालत की अवमानना के आरोप का सामना कर रहे कोलकता हाईकोर्ट के जज जस्टिस करनन ने तो भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर और सुप्रीम कोर्ट के कई अन्य न्यायाधीशों को पिछले महीने पांच साल की सज़ा सुना दी थी।

जस्टिस करनन ने कई जजों के खिलाफ प्रधानमंत्री और संवैधानिक पदों पर मौजूद लोगों को पत्र लिखे थे और गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

उनके न्यायिक और प्रशासनिक काम करने पर मुख्य न्यायधीश की बेंच ने रोक लगा दी गई थी। इसलिए उनके पास ऐसा करने का न्यायिक अधिकार नहीं है।

इसके बाद कोर्ट की अवमानना के मामले में मुख्य न्यायधीश की बेंच ने जस्टिस करनन की गिरफ़्तारी के लिए ग़ैर ज़मानती वारंट जारी किए थे।

4. जस्टिस महेश चंद्र शर्मा

अभी हाल ही में राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए गाय को राष्‍ट्रीय पशु घोषित करने की सिफारिश की है। उन्होंने राज्य सरकार से इसके लिए कदम उठाने को कहा है।

जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने गोहत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान किए जाने की भी सिफारिश की। इस फैसले के ही दिन वो रिटायर भी हो गए। इसके अलावा उन्होंने मोर के ब्रह्मचारी होने का विवादित बयान भी दिया है। उन्‍होंने यहां तक कह डाला कि मोर सेक्‍स नहीं करता, मोरनी आंसू पीकर बच्‍चे पैदा करती है।

5. जस्टिस प्रतिभा रानी

जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के मामले में जमानत देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट की जज प्रतिभा रानी ने जो कहा था, उसकी ख़ासी चर्चा हुई।

कुछ जेएनयू छात्रों के द्वारा आयोजित किए गए कार्यक्रम में कथित तौर पर की गई नारेबाजी जिस तरह की विचारधारा दिखती है, उसके बाद उनकी सुरक्षा के मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की बात नहीं आती है।

जस्टिस प्रतिभा रानी ने कहा- "मुझे लगता है कि यह एक तरह का संक्रमण है जिससे ये छात्र संक्रमित हो गए हैं, और इससे पहले कि यह महामारी का रूप ले, इसे क़ाबू करने या ठीक करने की ज़रूरत है।"

उन्होंने अपने फैसले में आगे कहा था कि जब भी किसी तरह का संक्रमण अंग में फैलता है, उसे ठीक करने के लिए खाने के लिए एंटीबायोटिक दिए जाते हैं। लेकिन जब यह काम नहीं करता तो दूसरे चरण का इलाज किया जाता है।

ये भी कहा गया था कि कभी-कभी सर्जरी की भी ज़रूरत होती है और जब संक्रमण से अंग में सड़न होने का खतरा पैदा हो जाए तो उस अंग को काटकर अलग कर देना ही इलाज होता है।


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