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दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

लखनऊ से सीतापुर जाने वाली रोडवेज बस यूपी 34 टी 8311 शुक्रवार दोपहर खदरा पुल के पास खड़ी सवारी भर रही थी। बस में महज तीन –चार मुसाफिर। इसी तरह से लखीमपुर जाने वाली बस संख्या यूपी 34 टी 3048 में भी महज दो मुसाफिर। ये बसें काफी देर तक बीच सड़क पर खड़ी यात्रियों की बांट जोहती रहीं लेकिन मुसाफिर न मिले तो वैसे ही आगे बढ़ गई। सवाल यह है कि आखिर बीच सड़क पर स्टार्ट खड़ी इन बसों को बिना मुसाफिर बस अड्डे से कैसे रवाना कर दिया गया। बात उस वक्त और भी दीगर हो जाती है, जब एक दिन पहले ही दिल्ली जाने वाली स्कैनिया बस को कम मुसाफिर के कारण के रद्द कर दिया जाता है। कई दिन पहले आरक्षण कराने वाले मुसाफिर भी समय से सफर नहीं कर पाते हैं। मगर रोडवेज ने अपने फायदे के लिए बस को न चलाना ही बेहतर मान लिया। सवाल यह है कि दो सेवाओं के लिए अलग अलग नियम क्यों।

दरअसल वोल्वो-स्कैनिया जैसी बसें भी रोडवेज के अनुबंध पर ही है। इन्हें संचालन के प्रति किमी की दर से भुगतान करना होता है और इस कारण से बस में मुसाफिर चले न चले लेकिन बस चलने पर उसका भुगतान रोडवेज को करना ही होता है। इस कारण से इन बसों में लोड फैक्टर को लेकर रोडवेज प्रबंधन काफी सतर्क रहता है। हालांकि इन बसों को कम मुसाफिर चलाने के भी कई मामले पिछले दिनों में सामने आ चुके हैं। वहीं साधारण अनुबंधित बसों में रोडवेज लोड फैक्टर के नाम पर सारी कटौती बस की आय से कर लेता है। अब इसमे रोडवेज को कोई घाटा नहीं होता, इस कारण से उन्हें बिना सवारी ही स्टेशन से निकाल दिया जाता है। यह खेल तब हो रहा है जबकि रोडवेज प्रबंधन के स्पष्ट आदेश है कि तीस फीसद से कम लोड पर बसों का संचालन न किया जाएं लेकिन यह आदेश रोडवेज की अपनी बसों पर ही लागू होते हैं। अन्यथा अनुबंधित बसों में इसे लागू नहीं कराया जाता। नतीजा यह रहता है कि खदरा पुल हो या फिर पुरनिया क्रासिंग या गोमतीनगर मोड़ पर कई –कई बसें सवारी का इंतजार करते दिख रही हैं।

अपनी अपनी दलील

कैसरबाग बस अड्डे के सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक अमरनाथ सहाय के मुताबिक स्कैनिया बस को कम से कम पंद्रह सवारी पर चलाया जाता है। रही बात साधारण अनुबंधित बस की तो उनसे पचास से साठ फीसद लोड फैक्टर लिया जाता है। बस को कम सवारी पर रवाना कर दिया जाता है और वह रास्ते में मुसाफिर लेकर अपना लोड फैक्टर निकलती है। अन्यथा उन्हें किए जाने वाले प्रशासनिक शुल्क से कटौती की जाती है। जबकि दूसरी तरफ मुख्य प्रधान प्रबंधक संचालन एचएस गाबा के मुताबिक खाली बसों को निकाला जाना गलत है। वह ही एक ही रूट की कई बसों को। इसे राष्ट्रीय क्षति होती है। केवल उन स्थिति में बस को रद नहीं किया जाता कि उसके बाद अगली सेवा में ज्यादा समय हों। अन्यथा मुसाफिरों को एक ही बस में क्लब में करके भेजा जा सकता है। अगर ऐसा हो रहा है तो इसकी जांच की जाएगी और जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई होगी।

दूसरी तरफ अनुबंधित बस संचालन से जुड़े आपरेटर रोडवेज पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लंबे समय से लगाते रहे हैं। बस संचालकों के मुताबिक जहां पर रोडवेज को अपनी जेब से भुगतान करना होता है, वहां पर नियम बदल जाते हैं लेकिन साधारण अनुबंधित सेवाओं में सारी कटौती बस आपटेर की आय से कर ली जाती है, इसलिए जानते बूझते खाली बसें दौड़ाई जाती है।

 

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