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दि राइजिंग न्यूज़

अभिषेक पाण्डेय

लखनऊ।

 

ज्येष्ठ महीने में पड़ने वाले मंगलवार यानी बड़ा मंगल। राजधानी में ज्येष्ठ महीने के ये मंगल किसी उत्सव से कम नहीं होते। हर महावीर के जयकारें और गुणगान और साथ में एक से एक शानदार पकवान। वह भी भंडारे में। यह केवल आस्था का प्रतीक नहीं है बल्कि इस परंपरा के पीछे इतिहास है। कहा जाता है कि लखनऊ में बड़े मंगल की शुरुआत नवाबी काल से हुई और उसके बाद से लगातार इसके स्वरूप में भव्यता आई। ज्योतिषातार्यों के मुतबिक, ज्येष्ठ मास के मंगलवार की अपनी विशेष महत्ता है इस महीने पड़ने वाले सभी मंगलवार को यहां “बड़े मंगल” के तौर पर मनाया जाता है मान्यता है कि ज्येष्ठ माह में पड़ने वाल इन मंगलवार को लखनऊ में कोई भूखा नहीं सोता है।

पवन पुत्र हनुमान हुए थे प्रकट

मान्यता है कि राजधानी में बड़े मंगल का मेला लगभग 400 साल पहले अलीगंज के नए हनुमान मंदिर से शुरू हुआ था। उस वक्त खासाराम नामक महंत ने एक सपना देखा था। ख्वाब में उन्होंने बजरंगबली की मूर्ति देखी जो ज़मीन के अन्दर थी। महंत ने अपने इस सपने की जानकारी नवाब वाजिद अली शाह को दी। नवाब ने तुरंत बताए गए स्थान पर खुदाई कराई और वहां से पवन पुत्र हनुमान की मूर्ति प्राप्त की। आपको बता दें कि मुगल नवाब को बजरंगबली में बड़ी आस्था थी। उन्होंने ही हनुमान मंदिर का निर्माण कराया था। इस मंदिर की स्थापना ज्येष्ठ के पहले बड़े मंगल को हुई थी।

श्रीराम के अनुज ने की थी इस पावन परंपरा की शुरुआत

ज्येष्ठ के पहले मंगल के दिन भगवान लक्ष्मण ने लखनऊ को बसाया था। उस वक्त इसका नाम लक्ष्मणपुर (लखनपुर) था। उस वक्त उन्होंने बड़े मंगल को मनाने की परंपरा शुरू की थी। तबसे लेकर आज तक यहां बड़ा मंगल धूम-धाम से मनाया जाता है।

तुलसीदास भी जुड़े हैं इस परम्परा से  

जानकारों के मुताबिक सन 1584 में मेडिकल कॉलेज के नजदीक आगामीर ड्योढ़ी पास स्थित छांछी कुआं हनुमान मंदिर में संत गोस्वामी तुलसीदास आकर रुके थे। यहां पर उन्हें पवनसुत के साक्षात दर्शन हुए और उसके बाद उन्होंने यहां पर भव्य हनुमान मंदिर की स्थापना की और वहीं से बड़े मंगल की परंपरा शुरु हुई।

नवाब मोहम्मद अली शाह का भी जुड़ा है इतिहास 

इतिहासकारों के मुताबिक, बड़े मंगल की परम्परा मुगल शासक नवाब मोहम्मद अली शाह ने की थी। नवाब के बेटे की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी। उनकी बेगम रूबिया ने अपने बेटे का कई जगह इलाज कराया, लेकिन कुछ भी फायदा नहीं हुआ। तभी उनको जानकारी मिली कि इसका उपचार केवल पवन पुत्र हनुमान की कर सकते हैं। बेटे की सलामती की मन्नत मांगने वह अलीगंज के हनुमान मंदिर आईं। वहां पुजारी ने उनसे बेटे को मंदिर में ही छोड़ने को कहा। रूबिया ने ठीक वैसा ही किया। वो रात में बेटे को मंदिर में ही छोड़ गईं। रातभर में उनके बेटे को हनुमान जी की कृपा लगी। दूसरे दिन रूबिया को बेटा पूरी तरह स्वस्थ मिला। महावीर के इस चमत्कार से अभिभूत होकर उन्होंने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। उनका लगाया प्रतीक चिन्ह चांदतारा आज भी मंदिर के गुंबद पर मौजूद है। मुगल शासक ने जेठ महीने में पड़ने वाले मंगल को पूरे नगर में गुड़धनिया (भुने हुए गेहूं में गुड़ मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया। मंदिर के बाहर प्याऊ भी लगवाए गए। तभी से इस बड़े मंगल की परम्परा की नींव पड़ी।

सपने का एक और कनेक्शन

करीब 400 साल पहले लखनऊ के नवाब सुजा-उद-दौला की दूसरी पत्नी जनाब-ए-आलिया को स्वप्न आया कि उसे हनुमान मंदिर का निर्माण कराना है। इस आदेश को पूरा करने के लिए उन्होंने हनुमान की मूर्ति मंगवाई। इस मूर्त‍ि को हाथी पर लाया जा रहा था। यात्रा के दौरान अचानक हाथी अलीगंज के एक स्थान पर बैठ गया और वहां से उठने का नाम नहीं ले रहा था। बस फिर क्या था, आलिया ने उसी स्थान पर मंदिर बनवाना किया। वही मंदिर आज नया हनुमान मंदिर के रूप में जाना जा रहा है। मंदिर का निर्माण ज्येष्ठ महीने में पूरा हुआ। मंदिर बनने पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कराई गई और बड़ा भंडारा हुआ। तभी से ज्येष्ठ महीने का हर मंगलवार बड़ा मंगल के रूप में मनाने की परम्परा चल पड़ी। उसके बाद ही बड़े मंगल पर भंडारे और विविध आयोजन का सिलसिला बदस्तूर चल रहा है।

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