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मूंदौं आंख कतहु कछु नाहीं

Rising At 8am | 08-Dec-2017 | Posted by - Admin

 

  • लगातार बढ़ रही हादसों में मौत के बावजूद परिवहन विभाग उदासीन
  • सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी नहीं दिखता सुधार
   
Ground reports of Accidents in Lucknow City

दि राइजिंग न्‍यूज

संजय शुक्ल

लखनऊ।

 

प्रदेश में हर बुधवार को हेलमेट व सीट बेल्ट की जांच। प्रदेश की परिवहन आयुक्त ने यह आदेश तो जारी कर दिया लेकिन हकीकत यह है कि अभियान के नाम पर केवल संख्या को ज्यादा से ज्यादा दिखाने की होड़ चल रही है। हकीकत यह है कि चाहे वह प्रतिबंधित डीजल वाहन हो या फिर बिना नियम कानून फर्राटा भरते स्कूली वाहन लेकिन उन्हें देखने वाला कोई नहीं है। खास बात यह है कि सारी मुस्तैदी हादसों पर अंकुश लगाने के बजाए कोर्ट को गुमराह करने की कवायद ज्यादा नजर आती है।

 

प्रदेश में सड़क हादसों मे इस वर्ष ही करीब 19 हजार लोगों की जान सड़क हादसों में जा चुकी है। यह देश में सबसे ज्यादा है। दक्षिण भारत के कई राज्यों के अलावा दिल्ली – महाराष्ट्र आदि राज्यों में सड़क हादसों को रोकने के लिए कार्ययोजना पर काम शुरू हो गया है। हाईवे पेट्रोलिंग से लेकर हादसे के बाद घाटलों को ट्रामा पहुंचाने के लिए बेहतर तरीके से काम हो रहा है लेकिन प्रदेश में परिवहन विभाग यह काम केवल कागजों पर कर रहा है। मुस्तैद परिवहन विभाग ने हाईवे पर घायलों की मदद के लिए कहने को करीब आधा दर्जन इंटरसेप्टर तो खरीद लिए लेकिन यह हाईवे पर पेट्रोलिंग करने के बजाए हाईवे पर वसूली करने में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। यही नहीं, इंटर सेप्टर के जरिए ई चालान को प्रोत्साहन दिया जा रहा है जबकि तकरीबन रोज तीन  लोग हादसों का शिकार हो रहे हैं।

जानलेवा फर्राटा बेलगाम

 

प्रदेश में सड़क हादसों मे होने वाली मौतों में करीब बीस फीसद लोग ओवरस्पीड वाहनों की चपेट में आते हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद वर्ष 2015 के बाद से बस आदि में स्पीड गवर्नर अनिवार्य कर दिया गया लेकिन परिवहन विभाग पुराने वाहनों में स्पीड गवर्नर को अनिवार्य नहीं कर पाया। खास बात यह है कि इसके लिए पिछले तीन साल में कई बार आदेश हुए लेकिन परिवहन विभाग फिटनेस में स्पीड गवर्नर की अनिवार्यता को लागू नहीं करा पाया। खास बात यह है कि अपर आय़ुक्त से लेकर परिवहन आयुक्त कर शासन को प्रस्ताव भेजे जाने का दावा करते हैं लेकिन सालों से इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं मिल सकी है। नतीजा यह है कि स्कूली वाहनों से लेकर तमाम बसें व अन्य कामर्शियल वाहन धड़ल्ले से खतरनाक ढंग से फर्राटा भर रहे हैं। विभाग की उदासीनता का आलम यह है कि स्कूली वाहनों में भी सारे नियम दरकिनार हो चुके हैं।

सुरक्षा के इंतजाम में भी खेल

 

कोहरे या अंधेरे में हादसों से बचाव के लिए वाहनों के पीछे रिफ्लेक्टर टेप लगाने का प्रावधान है। मगर इसमें परिवहन विभाग के अधिकारी अपनी जेब भर रहे हैं। परिवहन विभाग के फिटनेस ग्राउंड के बाहर लोकल टेप काट काट कर लगाए जा रहे हैं। जबकि इन रिफलेक्टर टेप की चौड़ाई मोटर यान नियमावली में परिभाषित है लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से खुलेआम खेल चल रहा है।

सबक ही खटारा वाहनों से

 

सड़क हादसों को लेकर परिवहन विभाग की सबसे ज्यादा उदासीनता वाहन चालकों को लाइसेंस जारी करने में बरती जा रही है। हकीकत यह है कि खटारा वाहनों के नाम पर होनहार चालक तैयार किए जा रहे हैं। इनमें कई वाहन तो दो से चार दशक तक पुराने हैं। परिवहन अधिकारी इसके व्यावसायिक वाहनों की उम्र तय न होने की दलील देती है। सवाल यह है कि अगर वाहन सही है तो फिर कंपनियां माडल क्यों बदल रही हैं। मगर परिवहन विभाग नियमों को ढाल बना कर अपनी जेब भर रहा है। खास बात यह है कि पिछले दिनों कामर्शियल लाइसेंस के लिए प्रमाणपत्र देने वाले मोटर ड्राइविंग स्कूलों के वाहनों की जांच हुई। जांच में तकरीबन नब्बे फीसद वाहन चलने लायक ही नहीं निकले लेकिन कुछ दिन की सतर्कता के बाद फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर पहुंच गया है। चार से दस हजार रुपये की कीमत पर आसानी कामर्शिलय लाइसेंस मिल रहा है। हर काउंटर पर पैसा तय है और प्रमाणपत्र तक बेचे जा रहे हैं।

"स्कूल बस, वैन, व अन्य कामर्शियल वाहनों में स्पीड गवर्नर के लिए आदेश तो जारी हो चुके हैं लेकिन अभी यह फिटनेस में अनिवार्य नहीं किए गए हैं। इस कारण से वाहन चालक भी स्पीड गवर्नर नहीं लगवा रहे हैं। इसका प्रस्ताव शासन में लंबित है। वहां से स्वीकृति मिलने बाद यह पूरी तरह अनिवार्य कर दिया जाएगा। फिटनेस में भी स्पीड गवर्नर की जांच की जाएगी।"

अशोक कुमार

संभागीय परिवहन अधिकारी

 

 

 

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